सीजी भास्कर, 28 अप्रैल : कृषि क्षेत्र में एक मौन क्रांति की शुरुआत हो रही है। राज्य सरकार अब रासायनिक खेती के जहरीले चक्र को तोड़कर ‘टिकाऊ और जैविक खेती’ की ओर मजबूती से कदम बढ़ा रही है। इसी कड़ी में जशपुर जिले से एक उत्साहजनक खबर सामने आई है, जहाँ रासायनिक उर्वरकों, विशेषकर यूरिया पर निर्भरता कम करने के लिए (Green Manure Benefits) का व्यापक प्रचार-प्रसार किया जा रहा है। मिट्टी की सेहत सुधारने और किसानों की लागत घटाने के उद्देश्य से जिले के 600 हेक्टेयर क्षेत्र को इस वर्ष प्रदर्शन के लिए चुना गया है।
मिट्टी की संजीवनी है हरी खाद
कृषि विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि पिछले कुछ दशकों में रसायनों के अंधाधुंध प्रयोग से मिट्टी की उपजाऊ शक्ति क्षीण हुई है। ऐसे में (Green Manure Benefits) एक प्राकृतिक उपचार के रूप में उभरा है। विभाग द्वारा जिले के सभी विकासखंडों में हरी खाद के प्रदर्शन आयोजित किए जा रहे हैं। विभाग ने किसानों से अपील की है कि वे रसायनों के पीछे भागने के बजाय कृषि विभाग के मैदानी अमले से संपर्क कर इस प्राचीन और वैज्ञानिक तकनीक को अपनाएं। यह तकनीक न केवल मिट्टी की सेहत में सुधार करती है, बल्कि फसलों की दीर्घकालीन उत्पादकता भी सुनिश्चित करती है।
क्या है हरी खाद बनाने की विधि
हरी खाद तैयार करना बेहद सरल और कम लागत वाली प्रक्रिया है। इसके अंतर्गत ढेंचा, सनई, मूंग, उड़द और बरसीम जैसी फसलों को खेत में उगाया जाता है। जब ये फसलें 40 से 50 दिन की हो जाती हैं और उनमें फूल आने लगते हैं, तब उन्हें खेत में ही जुताई कर मिट्टी में दबा दिया जाता है। इस (Green Manure Benefits) प्रक्रिया के ठीक 2 से 3 सप्ताह बाद मुख्य फसल की बुवाई की जाती है। मिट्टी में दबी हुई ये फसलें सड़कर प्राकृतिक खाद का रूप ले लेती हैं, जिससे मिट्टी को वे सभी पोषक तत्व मिलते हैं जो बाजार में मिलने वाले महंगे उर्वरकों में होते हैं।
यूरिया की निर्भरता में आएगी भारी कमी
वर्तमान में किसान यूरिया और डीएपी जैसे उर्वरकों के लिए काफी खर्च करते हैं, लेकिन (Green Manure Benefits) अपनाने से इस खर्च में भारी कटौती संभव है। हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में नाइट्रोजन, पोटाश और अन्य सूक्ष्म पोषक तत्वों की मात्रा स्वतः ही बढ़ जाती है। जैविक पदार्थों की अधिकता के कारण मिट्टी की जलधारण क्षमता (Water Holding Capacity) बेहतर होती है और भूमि भुरभुरी हो जाती है। यह प्रक्रिया यूरिया की आवश्यकता को 25 से 40 प्रतिशत तक कम कर सकती है, जो किसानों के लिए आर्थिक रूप से बड़ा वरदान है।
पर्यावरण और किसान दोनों का हित
खेती में रसायनों का कम उपयोग न केवल शुद्ध अनाज पैदा करने में मदद करता है, बल्कि पर्यावरण संरक्षण के लिए भी आवश्यक है। विशेषज्ञों के अनुसार, (Green Manure Benefits) का उपयोग कम निवेश में अधिक मुनाफे का सौदा है। इससे भूमिगत जल प्रदूषित नहीं होता और मित्र कीटों की संख्या में वृद्धि होती है। राज्य सरकार की यह पहल किसानों को आत्मनिर्भर बनाने और खेती को घाटे के सौदे से बाहर निकालने की दिशा में एक निर्णायक कदम साबित हो रही है।
जशपुर बना प्रयोग का केंद्र
जशपुर जिले में 600 हेक्टेयर का यह प्रदर्शन राज्य के अन्य जिलों के लिए भी एक रोल मॉडल बनेगा। प्रशासन ने इस (Green Manure Benefits) कार्यक्रम के तहत बीज वितरण और तकनीकी मार्गदर्शन की पुख्ता व्यवस्था की है। कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर प्रदेश का हर किसान अपने खेत के एक छोटे हिस्से में भी हरी खाद का प्रयोग शुरू करे, तो आने वाले समय में छत्तीसगढ़ ‘जैविक कृषि राज्य’ के रूप में देश में अपनी नई पहचान बनाएगा।
भविष्य की टिकाऊ खेती
मुख्यमंत्री के विजन के अनुरूप, छत्तीसगढ़ अब ऐसी खेती की ओर बढ़ रहा है जो न केवल वर्तमान पीढ़ी की जरूरतें पूरी करे, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी जमीन को उपजाऊ बनाए रखे। हरी खाद के इस व्यापक प्रदर्शन और इसके (Green Manure Benefits) को देखते हुए किसानों में खासा उत्साह है। अब किसान धीरे-धीरे यह समझने लगे हैं कि खेत की असली शक्ति रसायनों के बैग में नहीं, बल्कि स्वयं प्रकृति की गोद में छिपी है।


