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Home » A wave of faith in Bhilai : ‘मूल सोमनाथ’ के अवशेषों के दर्शन को पहुंचे हजारों भक्त

A wave of faith in Bhilai : ‘मूल सोमनाथ’ के अवशेषों के दर्शन को पहुंचे हजारों भक्त

By Newsdesk Admin
29/04/2026
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सीजी भास्कर 29 अप्रैल I भिलाई के सेक्टर-10 स्थित गुंडिचा मंडप में प्राचीन सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के अवशेषों के दर्शन के लिए हजारों श्रद्धालु पहुंचे। इस विशेष आयोजन में दर्शन, सत्संग और आध्यात्मिक संवाद का कार्यक्रम रखा गया, जिसमें भक्तों की गहरी आस्था और उत्साह देखने को मिला। (A wave of faith in Bhilai)

Contents
  • राज्यव्यापी दर्शन यात्रा का हिस्सा : A wave of faith in Bhilai
  • अवशेषों को ‘मूल सोमनाथ’ से जोड़ा गया
  • भविष्यवाणी और 100 साल की परंपरा
  • 2025 में अवशेष सौंपे गए : A wave of faith in Bhilai
  • सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का धार्मिक महत्व
  • ऐतिहासिक उल्लेख और रहस्य
  • चुंबकीय शक्ति का वैज्ञानिक तर्क
  • पौराणिक मान्यताएं और आध्यात्मिक पक्ष
  • वैज्ञानिक दावों पर भी चर्चा
  • पुनर्स्थापना और देशभर में दर्शन : A wave of faith in Bhilai
  • दिल्ली से शुरू हुई सार्वजनिक प्रस्तुति
  • ज्ञान और परंपरा से जुड़ा पहलू
  • कुंभ से भिलाई तक चर्चा में अवशेष

राज्यव्यापी दर्शन यात्रा का हिस्सा : A wave of faith in Bhilai

यह आयोजन आर्ट ऑफ लिविंग छत्तीसगढ़ द्वारा 20 से 30 अप्रैल तक विभिन्न जिलों में आयोजित दर्शन यात्रा का हिस्सा है। इस यात्रा का उद्देश्य लोगों को इन प्राचीन अवशेषों के दर्शन कराना और उनकी आध्यात्मिक महत्ता से जोड़ना है।

अवशेषों को ‘मूल सोमनाथ’ से जोड़ा गया

कार्यक्रम का मुख्य आकर्षण वे अवशेष रहे, जिन्हें आर्ट ऑफ लिविंग और आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर से जुड़े सूत्र ‘प्राचीन मूल सोमनाथ ज्योतिर्लिंग’ का हिस्सा मानते हैं। मान्यता है कि 11वीं शताब्दी में महमूद गजनवी के हमले के बाद इन अवशेषों को दक्षिण भारत के अग्निहोत्री परिवारों ने सुरक्षित रखा था।

भविष्यवाणी और 100 साल की परंपरा

बेंगलुरु के स्वामी प्रणवानंद के अनुसार, 1924 में कांची के शंकराचार्य श्री जयेंद्र सरस्वती ने भविष्यवाणी की थी कि इस शिवलिंग को 100 वर्षों तक सार्वजनिक नहीं किया जाए। उन्होंने यह भी कहा था कि एक समय बाद कर्नाटक में एक ऐसे संत को यह सौंपा जाएगा, जिनके नाम में ‘शंकर’ जुड़ा होगा और जो इसे उचित रूप में स्थापित करेंगे।

2025 में अवशेष सौंपे गए : A wave of faith in Bhilai

जनवरी 2025 में अग्निहोत्री परिवार ने श्री श्री रविशंकर से संपर्क कर यह अवशेष उन्हें सौंप दिए। यह प्रक्रिया शंकराचार्य की भविष्यवाणी के अनुरूप बताई जा रही है, जिसने श्रद्धालुओं के बीच विशेष आकर्षण पैदा किया।

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग का धार्मिक महत्व

सोमनाथ ज्योतिर्लिंग को 12 ज्योतिर्लिंगों में पहला और अत्यंत शक्तिशाली माना जाता है। ऐतिहासिक उल्लेखों में यह भी कहा जाता है कि शिवलिंग हवा में स्थित रहता था, जो सदियों से चर्चा का विषय रहा है।

ऐतिहासिक उल्लेख और रहस्य

11वीं शताब्दी के विद्वान अल-बरुनी के यात्रा वृत्तांत में उल्लेख मिलता है कि मंदिर के गर्भगृह में शिवलिंग बिना किसी सहारे के हवा में स्थित प्रतीत होता था, जो उस समय भी एक रहस्य बना हुआ था।

चुंबकीय शक्ति का वैज्ञानिक तर्क

इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का मानना है कि यह संभवतः चुंबकीय शक्ति (मैग्नेटिक लेविटेशन) का उदाहरण रहा होगा। मंदिर की संरचना में लगाए गए शक्तिशाली चुंबकीय पत्थरों के संतुलन से शिवलिंग हवा में स्थिर रहता था। इसे प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग की अद्भुत उपलब्धि भी माना जाता है।

पौराणिक मान्यताएं और आध्यात्मिक पक्ष

पुराणों के अनुसार, सोमनाथ ज्योतिर्लिंग स्वयंभू है और इसकी स्थापना चंद्रदेव द्वारा की गई थी। हवा में स्थित होने की मान्यता इसे और अधिक दिव्य और अलौकिक बनाती है, जिससे इसकी धार्मिक महत्ता और बढ़ जाती है। (A wave of faith in Bhilai)

वैज्ञानिक दावों पर भी चर्चा

कुछ दावों में शिवलिंग में असामान्य चुंबकीय गुणों की बात कही गई है। इसकी कथित रासायनिक संरचना-बेरियम, सिलिकॉन, मैग्नीशियम, सल्फर और कम आयरन– को लेकर भी शोधकर्ताओं के बीच चर्चा रही है। कुछ इसे सामान्य चट्टानों या उल्कापिंडों से अलग मानते हैं।

पुनर्स्थापना और देशभर में दर्शन : A wave of faith in Bhilai

स्वामी प्रणवानंद ने बताया कि श्री श्री रविशंकर के मार्गदर्शन में इन अवशेषों की पुनर्स्थापना और देशभर में दर्शन यात्रा आयोजित की जा रही है। इसका उद्देश्य इन ऐतिहासिक अवशेषों को फिर से जनमानस से जोड़ना है।

दिल्ली से शुरू हुई सार्वजनिक प्रस्तुति

उन्होंने बताया कि मार्च 2025 में दिल्ली में पहली बार इन अवशेषों का सार्वजनिक प्रदर्शन किया गया। इसके बाद देशभर में रुद्राभिषेक, सत्संग और दर्शन कार्यक्रमों के जरिए इन्हें लोगों तक पहुंचाया जा रहा है।

ज्ञान और परंपरा से जुड़ा पहलू

सांसद विजय बघेल के अनुसार, यह केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा और प्राचीन विज्ञान को समझने का भी अवसर है।

कुंभ से भिलाई तक चर्चा में अवशेष

आयोजकों के मुताबिक, प्रयागराज कुंभ (फरवरी 2025) में भी इन दुर्लभ अवशेषों के दर्शन कराए गए थे, जहां संतों और धर्माचार्यों ने इसकी विशेषता पर चर्चा की थी। (A wave of faith in Bhilai)

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