सीजी भास्कर, 17 मई। देश की सर्वोच्च अदालत में अब जजों की संख्या बढ़ाकर 38 कर दी गई है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने केंद्र सरकार के प्रस्ताव को मंजूरी दे दी है। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में मुख्य न्यायाधीश सहित कुल 38 जज कार्यरत होंगे। सरकार का मानना है कि इस फैसले से लंबित मामलों के निपटारे में तेजी आएगी और न्याय व्यवस्था मजबूत होगी। (The pace of justice will increase in the Supreme Court)
राष्ट्रपति की मंजूरी के बाद लागू हुआ फैसला : The pace of justice will increase in the Supreme Court
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने का प्रस्ताव रखा था, जिसे राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने मंजूरी दे दी। केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश 2026 लागू कर दिया गया है।
इस संशोधन के तहत मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 कर दी गई है। यानी अब सुप्रीम कोर्ट में कुल 38 जज होंगे। इससे पहले वर्ष 2019 में जजों की संख्या 30 से बढ़ाकर 33 की गई थी।
बढ़ते मामलों को देखते हुए लिया गया फैसला
सरकार का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट में (The pace of justice will increase in the Supreme Court) लगातार बढ़ रहे मामलों और न्यायिक कार्यभार को देखते हुए यह फैसला जरूरी हो गया था। वर्तमान में सर्वोच्च अदालत में हजारों मामले लंबित हैं, जिनके शीघ्र निपटारे के लिए अतिरिक्त जजों की आवश्यकता महसूस की जा रही थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पहले ही इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी थी। इसके बाद अध्यादेश के जरिए इसे लागू किया गया। सरकार का मानना है कि इससे मामलों की सुनवाई तेज होगी और आम लोगों को जल्द न्याय मिल सकेगा।
कानूनी समुदाय ने फैसले का किया स्वागत : The pace of justice will increase in the Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन और वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने सरकार के इस कदम का स्वागत किया है। कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती जनसंख्या और मामलों की संख्या को देखते हुए जजों की संख्या बढ़ाना समय की मांग थी।
वरिष्ठ अधिवक्ताओं के मुताबिक, सुप्रीम कोर्ट की नई इमारत का विस्तार भी किया जा रहा है, जिससे अतिरिक्त जजों के लिए पर्याप्त व्यवस्था हो सकेगी। हालांकि कुछ विशेषज्ञों ने यह भी कहा कि केवल जजों की संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि न्यायिक सुधार, बेहतर केस मैनेजमेंट और तकनीकी सुधारों की भी जरूरत है।



