सीजी भास्कर, 18 मई। बस्तर के कई गांवों में इन दिनों फिर से बोधघाट परियोजना को लेकर हलचल तेज दिखाई (Bodhghat Project) दे रही है। इंद्रावती नदी किनारे बसे इलाकों में सर्वे टीमों की आवाजाही बढ़ने के बाद ग्रामीणों के बीच चर्चाएं शुरू हो गई हैं। कई गांवों में लोग जमीन और भविष्य को लेकर आपस में बातचीत करते नजर आ रहे हैं। आदिवासी परिवारों के बीच सबसे ज्यादा चिंता विस्थापन को लेकर दिखाई दे रही है।
गांवों में माहौल धीरे धीरे बदलता नजर आ रहा है। कुछ जगहों पर लोग प्रशासनिक गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं तो कहीं परियोजना को लेकर पुराने विवाद फिर चर्चा में आने लगे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें अपनी जमीन, जंगल और गांव के अस्तित्व को लेकर डर सताने लगा है।
कई साल बाद फिर शुरू हुआ सर्वे
बोधघाट परियोजना को लेकर करीब 45 साल बाद फिर से सर्वे कार्य शुरू किया गया है। यह योजना पहली बार वर्ष 1979 में मंजूर हुई थी। शुरुआत में इसका मकसद बिजली उत्पादन बताया गया था, लेकिन अब इसे बहुउद्देशीय परियोजना के रूप में आगे बढ़ाया जा रहा है। मौजूदा समय में नई सर्वे प्रक्रिया चल रही है, जिसे अगले तीन महीनों के भीतर पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है।
अब लागत पहुंची 49 हजार करोड़ के करीब
अधिकारियों के मुताबिक, सर्वे रिपोर्ट के आधार पर नई विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार की जाएगी। बताया जा रहा है कि परियोजना की अनुमानित लागत अब बढ़कर करीब 49 हजार करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। सरकार का मानना है कि इस योजना से बस्तर क्षेत्र में सिंचाई व्यवस्था को मजबूत किया जा सकेगा और किसानों को ज्यादा फायदा मिलेगा।
56 गांवों पर मंडरा रहा विस्थापन का खतरा
परियोजना के निर्माण से इंद्रावती नदी किनारे बसे कई गांव प्रभावित हो सकते हैं। स्थानीय ग्रामीणों का कहना है कि बांध बनने से दर्जनों गांवों के अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जाएगा। ग्रामीणों ने साफ कहा है कि वे अपनी जमीन और जल जंगल को बचाने के लिए संघर्ष करेंगे। इलाके में इस मुद्दे को लेकर लोगों की चिंता लगातार बढ़ती दिखाई दे रही है।
कई जिलों को सिंचाई सुविधा मिलने का दावा
जानकारी के अनुसार, इस परियोजना से दंतेवाड़ा, बीजापुर और सुकमा जिलों के सैकड़ों गांवों को सिंचाई सुविधा मिलने की संभावना जताई जा रही है। प्रशासन का दावा है कि इससे कृषि उत्पादन बढ़ेगा और किसानों को पूरे साल पानी उपलब्ध हो सकेगा।
पुराने विवाद फिर आए चर्चा में
बोधघाट परियोजना पहले भी पर्यावरण और विस्थापन के मुद्दों को लेकर विवादों में रही है। वर्ष 1984 में इस योजना के लिए ऋण स्वीकृत हुआ था, लेकिन बाद में पर्यावरणीय आपत्तियों और आदिवासी विरोध के चलते काम रोक दिया गया था। अब परियोजना को नए स्वरूप में आगे बढ़ाने की तैयारी चल रही है। हालांकि, इसके साथ ही प्रभावित क्षेत्रों में विरोध और आंदोलन की संभावना भी बढ़ने लगी है।



