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CG High Court Judgment  : हाई कोर्ट का बड़ा और कड़ा फैसला, ‘काम नहीं तो वेतन नहीं’

By Newsdesk Admin
31/05/2026
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CG High Court Judgment 
CG High Court Judgment 

सीजी भास्कर, 31 मई : छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय (CG High Court Judgment) ने शासकीय सेवा से बर्खास्त और बाद में अदालत से बेदाग बरी होने वाले कर्मचारियों के वित्तीय अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण, ऐतिहासिक और दूरगामी प्रभाव वाला कानूनी फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने एक कड़े मामले की सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया है कि किसी भी शासकीय या अर्धशासकीय कर्मचारी को आपराधिक मामले में बरी (Acquit) होने मात्र से उसकी बर्खास्तगी अवधि का पूरा बकाया वेतन और अन्य आर्थिक लाभ पाने का कोई कानूनी अधिकार नहीं मिल जाता।

Contents
  • विशेष अदालत से हुई थी जेल
  • चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने खारिज की रिट अपील

माननीय अदालत ने अपने इस ऐतिहासिक फैसले में “नो वर्क, नो पे” यानी “काम नहीं तो वेतन नहीं” के सर्वमान्य सिद्धांत को पूरी तरह से सर्वोपरि माना है। विद्युत मंडल के एक पूर्व अधिकारी द्वारा दायर की गई अपील को कड़ाई से खारिज करते हुए बिलासपुर हाईकोर्ट (CG High Court Judgment) ने इस बड़े कानूनी सस्पेंस से पूरी तरह पर्दा उठा दिया है, जिसने भविष्य के ऐसे सैकड़ों मामलों के लिए एक कड़ा नियम और नजीर तय कर दी है।

दरअसल, यह पूरा मामला केवल एक कर्मचारी के वेतन का नहीं है, बल्कि इसके पीछे भ्रष्टाचार के आरोप, जेल की सजा और फिर तकनीकी रूप से बरी होने के बाद मिलने वाले सरकारी भत्तों का एक बड़ा प्रशासनिक सस्पेंस छुपा हुआ था। मामले के मुताबिक, पीड़ित कर्मचारी को शुरुआत में सहायक श्रेणी-1 सिविल के पद पर नियुक्त किया गया था, जिसके बाद बेहतर परफॉर्मेंस को देखते हुए विभाग ने उसे पर्यवेक्षक सिविल (Supervisor Civil) के पद पर पदोन्नत किया था।

लेकिन, इसी दौरान उसके खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (Prevention of Corruption Act) के तहत एक कड़ा मामला दर्ज किया गया, जिसमें विशेष भ्रष्टाचार विरोधी अदालत ने उसे दोषी पाते हुए कड़ी सजा सुना दी। इस दोषसिद्धि के तुरंत बाद सक्षम प्राधिकारी ने कड़ा कदम (CG High Court Judgment) उठाते हुए उसे शासकीय सेवा से तत्काल प्रभाव से बर्खास्त कर दिया था।

विशेष अदालत से हुई थी जेल

इस पूरे कानूनी विवाद का सबसे पेचीदा और मार्मिक सस्पेंस तब शुरू हुआ जब संबंधित कर्मचारी ने विशेष अदालत के फैसले को चुनौती देने के लिए हाईकोर्ट में अपील दायर की। यह कड़ा कानूनी मुकदमा सालों तक अदालत के ढर्रे पर चलता रहा और इसी लंबी कानूनी लड़ाई के दौरान वह कर्मचारी अपने सेवाकाल को पूरा करते हुए सेवानिवृत्ति (Retirement) की निर्धारित आयु भी पार कर गया।

इसके बाद जब हाईकोर्ट में अंतिम सुनवाई हुई, तो अदालत ने उसे भ्रष्टाचार के सभी संगीन आरोपों से पूरी तरह बरी कर दिया। हाईकोर्ट से हरी झंडी मिलने के बाद बिजली विभाग ने उसका बर्खास्तगी आदेश तो सहर्ष वापस ले लिया, लेकिन विभाग ने कड़ा नियम (CG High Court Judgment) अपनाते हुए उसकी बर्खास्तगी की तारीख से लेकर सेवानिवृत्ति तक की लंबी अवधि का करोड़ों रुपये का बकाया वेतन और अन्य वित्तीय लाभ देने से साफ इनकार कर दिया, जिससे यह विवाद दोबारा भड़क उठा।

विभाग के इस फैसले से नाराज पूर्व कर्मचारी ने पहले सिंगल बेंच का दरवाजा खटखटाया, लेकिन वहां से याचिका खारिज होने के बाद उसने चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवीन्द्र कुमार अग्रवाल की संयुक्त खंडपीठ (Double Bench) के समक्ष एक आक्रामक अपील दायर की। कर्मचारी के वकीलों ने कूटनीतिक दलील दी कि चूंकि हाईकोर्ट ने उसे सस्पेंस से बाहर निकालते हुए पूरी तरह निर्दोष पाया है, इसलिए जितने समय वह जबरन नौकरी से बाहर रहा, उस पूरी अवधि का वेतन और महंगाई भत्ता पाना उसका मौलिक और संवैधानिक अधिकार है।

चीफ जस्टिस की खंडपीठ ने खारिज की रिट अपील

चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा की अगुवाई वाली खंडपीठ ने कर्मचारी की इन सभी दलीलों को सिरे से खारिज करते हुए देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) के कई पुराने और कड़े नीतिगत फैसलों का हवाला दिया। डिवीजन बेंच ने अपने कूटनीतिक फैसले में साफ किया कि:

“यदि किसी कर्मचारी को किसी आपराधिक मामले में दोषसिद्धि (Conviction) के ठोस आधार पर सेवा से बर्खास्त किया गया हो, तो बाद में केवल अपील मंजूर होने या तकनीकी आधार पर बरी होने की स्थिति में विभाग को यह मजबूर नहीं किया जा सकता कि वह उस अवधि का पूरा वेतन चुकाए। क्योंकि उस दौरान कर्मचारी ने विभाग के लिए कोई वास्तविक या भौतिक कार्य संपादित नहीं किया था।”

हाईकोर्ट ने अपने कड़े आदेश में स्पष्ट कहा कि सरकारी खजाने का पैसा केवल वास्तविक कर्तव्यों के निर्वहन के लिए होता है। चूंकि कर्मचारी ने उस विवादित अवधि में कोई काम नहीं किया था, इसलिए उस पर “काम नहीं तो वेतन नहीं” का सार्वभौमिक सिद्धांत पूरी तरह और कड़ाई से लागू होगा। अदालत के इस कड़े रुख के बाद प्रशासनिक और वित्तीय ढर्रे में एक बहुत बड़ा बदलाव (CG High Court Judgment) देखने को मिलेगा, क्योंकि अब दागी या सस्पेंड होने वाले कर्मचारियों के लिए बहाली के बाद बैक-वेतन (Back Wages) ऐंठना नामुमकिन हो जाएगा। बहरहाल, बिलासपुर हाईकोर्ट के इस कड़े जजमेंट ने यह तो साफ कर दिया है कि कानून केवल अधिकारों की रक्षा नहीं करता, बल्कि राज्य के वित्तीय हितों और कर्तव्यपरायणता की गति (CG High Court Judgment) को भी मजबूती प्रदान करता है।

 

 

 

 

 

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