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Home » High Court Decision : युक्तिकरण नीति को हाईकोर्ट की मंजूरी, अतिशेष व्याख्याताओं की अपील खारिज

High Court Decision : युक्तिकरण नीति को हाईकोर्ट की मंजूरी, अतिशेष व्याख्याताओं की अपील खारिज

By Newsdesk Admin
20/06/2026
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सीजी भास्कर, 20 जून :  छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने राज्य सरकार की युक्तिकरण नीति (High Court Decision) को सही ठहराते हुए अतिशेष घोषित किए गए वाणिज्य व्याख्याताओं को राहत देने से इनकार कर दिया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच के फैसले को बरकरार रखते हुए शिक्षकों द्वारा दायर रिट अपील को खारिज कर दिया।

Contents
  • क्या है पूरा मामला?
  • “छात्र नहीं तो शिक्षक रखने का औचित्य नहीं”
  • भेदभाव के आरोपों को अदालत ने नहीं माना
  • पसंदीदा स्थान पर पदस्थ रहने का अधिकार नहीं
  • सरकार की नीति के अनुरूप माना गया फैसला

अदालत ने स्पष्ट किया कि जहां किसी विषय के विद्यार्थी ही नहीं हैं, वहां उस विषय के शिक्षकों को बनाए रखने का कोई औचित्य नहीं है। ऐसे शिक्षकों को आवश्यकता वाले विद्यालयों में स्थानांतरित करना प्रशासनिक रूप से उचित कदम है।

क्या है पूरा मामला?

मामला जांजगीर-चांपा जिले के नवागढ़ विकासखंड स्थित शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय सिवनी से जुड़ा है। यहां पदस्थ दो वाणिज्य व्याख्याताओं को राज्य सरकार की युक्तिकरण प्रक्रिया के तहत अतिशेष घोषित किया गया था।

शिक्षा विभाग की जांच में सामने आया कि विद्यालय में वाणिज्य विषय का एक भी छात्र नामांकित नहीं है। इसके बाद दोनों शिक्षिकाओं का काउंसलिंग प्रक्रिया के माध्यम से मुंगेली जिले के अन्य विद्यालयों में स्थानांतरण कर दिया गया।

“छात्र नहीं तो शिक्षक रखने का औचित्य नहीं”

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यदि किसी विद्यालय में किसी विषय का एक भी विद्यार्थी अध्ययनरत नहीं है, तो वहां उस विषय के शिक्षकों को पदस्थ बनाए रखना तर्कसंगत नहीं माना जा सकता।

अदालत ने कहा कि राज्य सरकार का दायित्व है कि उपलब्ध शिक्षकों का उपयोग उन विद्यालयों में किया जाए, जहां विद्यार्थियों को वास्तव में उनकी आवश्यकता हो। इसलिए युक्तिकरण नीति के तहत किया गया स्थानांतरण प्रशासनिक दृष्टि से उचित है।

भेदभाव के आरोपों को अदालत ने नहीं माना

याचिकाकर्ता शिक्षकों ने अदालत में तर्क दिया था कि काउंसलिंग के दौरान जिले में उपलब्ध रिक्त पदों की जानकारी नहीं दी गई और उनके साथ भेदभावपूर्ण व्यवहार किया गया।

हालांकि राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि पूरी प्रक्रिया युक्तिकरण नीति के प्रावधानों के अनुरूप की गई। सरकार ने कहा कि वरिष्ठ शिक्षकों को पहले जिला स्तर पर विकल्प दिए गए थे, जिसके बाद संभाग स्तरीय काउंसलिंग के जरिए पदस्थापना की गई। अदालत ने राज्य सरकार के इस पक्ष को स्वीकार करते हुए कहा कि रिकॉर्ड में किसी प्रकार की मनमानी या भेदभाव के पर्याप्त प्रमाण नहीं मिले हैं।

पसंदीदा स्थान पर पदस्थ रहने का अधिकार नहीं

डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि तबादला और पदस्थापना प्रशासनिक विषय हैं। न्यायालय ऐसे मामलों में सीमित परिस्थितियों में ही हस्तक्षेप कर सकता है।

अदालत ने कहा कि कोई भी सरकारी कर्मचारी या शिक्षक अपनी पसंद के स्थान, गृह जिले या किसी विशेष विद्यालय में पदस्थ रहने का कानूनी अधिकार नहीं जता सकता। प्रशासनिक आवश्यकता और नीति के अनुसार सरकार पदस्थापना संबंधी निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र है।

सरकार की नीति के अनुरूप माना गया फैसला

हाईकोर्ट ने माना कि संबंधित विद्यालय में वाणिज्य विषय के विद्यार्थियों की संख्या शून्य थी। ऐसे में शिक्षकों को उन विद्यालयों में भेजना, जहां उनकी सेवाओं की आवश्यकता है, राज्य सरकार की युक्तिकरण नीति और शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाने की दिशा में उठाया गया उचित कदम है। अदालत के इस फैसले को राज्य सरकार की युक्तिकरण प्रक्रिया के समर्थन में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इससे भविष्य में ऐसे मामलों में प्रशासनिक निर्णयों को कानूनी मजबूती मिलने की संभावना है।

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