सीजी भास्कर, 25 जून। देश में आपातकाल की 51वीं बरसी पर एक बार फिर उस दौर की घटनाओं को याद (Emergency Anniversary) किया गया। राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर लोकतंत्र, संविधान और नागरिक अधिकारों को लेकर चर्चा तेज रही। इसी अवसर पर प्रधानमंत्री ने भी उस समय को भारतीय लोकतंत्र का सबसे कठिन दौर बताया।
प्रधानमंत्री ने आपातकाल के दौरान लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले लोगों को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा का संकल्प दोहराया। उन्होंने कहा कि देश को उस दौर से मिले सबक हमेशा याद रखने चाहिए।
संविधान और लोकतंत्र पर बताया सीधा प्रहार Emergency Anniversary
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 25 जून 1975 को लगाया गया आपातकाल भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे काला अध्याय था। उनके अनुसार उस समय संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा प्रहार हुआ था, जिसका असर पूरे देश ने महसूस किया। उन्होंने कहा कि उस कठिन समय में लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले सभी लोगों का योगदान हमेशा याद रखा जाएगा।
नागरिक अधिकारों पर लगी थीं पाबंदियां
प्रधानमंत्री ने कहा कि आपातकाल के दौरान नागरिक स्वतंत्रताओं को सीमित किया गया। अभिव्यक्ति की आजादी पर रोक लगी और कई राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों तथा सामाजिक कार्यकर्ताओं को जेल भेजा गया। उन्होंने यह भी कहा कि उस समय लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गंभीर असर पड़ा था।
संविधान की रक्षा का किया आह्वान
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत का संविधान देश के 140 करोड़ नागरिकों की आकांक्षाओं, अधिकारों और कर्तव्यों का प्रतीक है। उन्होंने देशवासियों से न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल्यों को मजबूत करने तथा संविधान की रक्षा के लिए हमेशा प्रतिबद्ध रहने (Emergency Anniversary) की अपील की।
दो साल तक लागू रहा था आपातकाल
देश में 25 जून 1975 को तत्कालीन राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 352 के तहत आपातकाल लागू किया गया था। यह अवधि 21 मार्च 1977 तक प्रभावी रही। भारतीय राजनीति में इस दौर को लोकतांत्रिक अधिकारों पर व्यापक प्रतिबंध और राजनीतिक उथल पुथल के लिए याद किया जाता है।



