पद्मश्री सम्मानित समाजसेविका फूलबासन बाई यादव ने कहा है कि जीवन की कठिन परिस्थितियां इंसान को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत बनाती हैं। उन्होंने अपने संघर्षपूर्ण जीवन को याद करते हुए बताया कि एक समय ऐसा भी था जब अत्यधिक गरीबी के कारण उनके पास पहनने के लिए फटी हुई साड़ी थी और परिवार का पालन-पोषण करना भी मुश्किल हो गया था।
उन्होंने बताया कि आर्थिक तंगी से परेशान होकर एक दिन वह अपने बच्चों के साथ आत्महत्या करने के इरादे से रेलवे ट्रैक तक पहुंच गई थीं। उसी दौरान उनकी छोटी बेटियों की मासूम पुकार ने उन्हें झकझोर दिया और उन्होंने जीवन से हार मानने के बजाय संघर्ष का रास्ता चुनने का फैसला किया। इसके बाद उन्होंने समाज सेवा के माध्यम से जरूरतमंद महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाने का संकल्प लिया।
फूलबासन बाई ने बताया कि उन्होंने वर्ष 2001 में मात्र 11 महिलाओं के साथ स्वयं सहायता समूह की शुरुआत की थी। बचत, स्वरोजगार, जैविक खेती, जल संरक्षण और सामाजिक जागरूकता जैसे कार्यों से यह अभियान लगातार बढ़ता गया। आज लाखों महिलाएं इस पहल से जुड़कर आत्मनिर्भर बनने की दिशा में काम कर रही हैं।
उन्होंने कहा कि समाज सेवा के रास्ते में शुरुआत में विरोध और अपमान झेलना पड़ता है, लेकिन ईमानदारी और निरंतर प्रयास से वही लोग बाद में सम्मान भी देते हैं। उनके अनुसार, समाज सेवा में पहले आलोचना मिलती है और फिर सराहना।
फूलबासन बाई ने कहा कि गरीबी ने उन्हें सबसे बड़ा सबक संघर्ष करना सिखाया। उनका मानना है कि यदि महिलाएं आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ें तो वे परिवार, समाज और देश के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। उन्होंने कहा कि उनका लक्ष्य अधिक से अधिक महिलाओं को आत्मनिर्भर बनाना और समाज में सकारात्मक बदलाव लाना है।



