देश की न्यायिक व्यवस्था में लंबित मामलों का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट में 10 वर्ष से अधिक समय से 10 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं, जबकि देश के 25 हाई कोर्ट में 30 साल से अधिक पुराने 80 हजार से ज्यादा मामलों का अब तक निपटारा नहीं हो सका है। अदालतों में वर्षों से लंबित मुकदमों के कारण लोगों को न्याय मिलने में लंबा इंतजार करना पड़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में हजारों पुराने मामले लंबित
उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट में 10 साल से अधिक पुराने 10 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। इनमें 558 मामले ऐसे हैं जो 20 वर्ष से अधिक समय से लंबित हैं, जबकि 26 मामलों का निस्तारण 30 साल से भी अधिक समय से नहीं हो पाया है। इसी तरह देश के विभिन्न हाई कोर्ट में भी 30 वर्ष से अधिक पुराने 80 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं।
केंद्र सरकार का कहना है कि मामलों के समय पर निपटारे में न्यायाधीशों की उपलब्धता, अदालतों का आधारभूत ढांचा, मामलों की जटिलता, गवाहों का सहयोग और न्यायिक प्रक्रियाओं का पालन जैसी कई बातें प्रभाव डालती हैं। सरकार ने यह भी बताया कि अदालतों में लंबित मामलों के निस्तारण के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास किए जा रहे हैं।
खाली पद और सुधारों पर सरकार का जोर
देश के 25 हाई कोर्ट में न्यायाधीशों के 1,122 स्वीकृत पदों में से 341 पद अभी भी रिक्त हैं। वहीं निचली अदालतों में 30,868 स्वीकृत पदों के मुकाबले 7,311 पद खाली हैं। न्यायिक पदों पर रिक्तियां भी मामलों के तेजी से निपटारे में बड़ी चुनौती मानी जा रही हैं।
सरकार के अनुसार, पांच वर्ष से अधिक पुराने मामलों के निस्तारण के लिए सभी हाई कोर्ट और जिला अदालतों में विशेष बकाया मामले समितियां गठित की गई हैं। इसके अलावा न्यायिक प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाने और लंबित मामलों का बोझ कम करने के उद्देश्य से नए आपराधिक कानूनों सहित कई विधायी सुधार भी लागू किए गए हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि लंबित मामलों में उल्लेखनीय कमी लाने के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति, आधारभूत ढांचे के विस्तार और तकनीक के व्यापक उपयोग पर और तेजी से काम करने की आवश्यकता है।



