Court Order Ignored by Officers : आदेश नहीं, अहंकार चलता है – न्यायालय की अवमानना का बढ़ता खेल
रायपुर। प्रदेश में Court Order Ignored by Officers (न्यायालय आदेश की अनदेखी) अब आम बात बन चुकी है। अफसरों की कार्यशैली इस हद तक कठोर और असंवेदनशील हो चुकी है कि माननीय न्यायालयों के स्पष्ट आदेश भी फाइलों में धूल खाते रह जाते हैं।
राजधानी रायपुर समेत कई ज़िलों में सरकारी अधिकारी न्यायिक आदेशों को लागू करने के बजाय, अपने पद का रौब दिखाने में व्यस्त रहते हैं। आदेश दिखाओ तो जवाब मिलता है — “जहां जाना है, जाइए।”
यह रवैया न केवल कानून का अपमान है बल्कि उस आम नागरिक के धैर्य की भी परीक्षा है जो इंसाफ़ की उम्मीद में सालों तक अदालतों के चक्कर काटता है।
- Court Order Ignored by Officers : आदेश नहीं, अहंकार चलता है – न्यायालय की अवमानना का बढ़ता खेल
- “लोक अदालत” बने न्याय की अंतिम उम्मीद
- वेतन वृद्धि का आदेश भी बेअसर — 750 कर्मचारियों का दर्द
- अफसरशाही का कवच — कानून को बनाते हैं ‘कमज़ोर’
- “धान खरीदी” के मौसम में नई हलचल — आंदोलन की तैयारी
- “बिना भय के प्रीत नहीं” — न्याय का अर्थ अब डर से भी है
“लोक अदालत” बने न्याय की अंतिम उम्मीद
कर्मचारी नेता विजय कुमार झा ने Chief Justice of India से अपील की है कि अब समय आ गया है जब Contempt Cases (अवमानना प्रकरणों) को लेकर एक विशेष लोक अदालत लगाई जाए।
उनका कहना है — “देश और प्रदेश में लाखों ऐसे मामले लंबित हैं जिनमें आदेश तो आ चुका है, लेकिन पालन अब तक नहीं हुआ। अधिकारी न डरते हैं, न शर्माते हैं।”
झा के अनुसार, अगर एक बार ऐसे अधिकारियों को लोक अदालत में बुलाकर सीधे पीड़ित पक्ष के सामने जवाब देना पड़े, तो “न्यायालय के आदेशों का डर और सम्मान दोनों वापस लौट आएंगे।”
वेतन वृद्धि का आदेश भी बेअसर — 750 कर्मचारियों का दर्द
रायपुर के Central Cooperative Bank (केंद्रीय सहकारी बैंक) में लगभग 750 कर्मचारी उच्च न्यायालय के आदेश के बावजूद वेतन वृद्धि से वंचित हैं।
झा बताते हैं, “अधिकारी आराम से ए.सी. कमरों में बैठे हैं, और पीड़ित कर्मचारी न्याय की प्रतीक्षा में सालों से परेशान हैं।”
ऑनलाइन न्याय व्यवस्था में Contempt Petition (अवमानना याचिका) को नंबर आने में ही दो साल लग जाते हैं, और इस बीच आदेश का मूल्य एक कागज़ से ज़्यादा नहीं रह जाता।
अफसरशाही का कवच — कानून को बनाते हैं ‘कमज़ोर’
प्रदेश के कई विभागों में अधिकारी खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं।
कर्मचारी, किसान, बेरोज़गार — सभी किसी न किसी रूप में Administrative Negligence (प्रशासनिक लापरवाही) का शिकार हैं।
जो व्यक्ति आवाज़ उठाता है, उसे “राग-द्वेष की भावना” से और प्रताड़ित किया जाता है।
10 साल तक न्याय पाने में लग जाना अब सामान्य हो गया है, और अंत में भी आदेश के पालन की कोई गारंटी नहीं रहती।
“धान खरीदी” के मौसम में नई हलचल — आंदोलन की तैयारी
वर्तमान में जब राज्य में धान खरीदी का मौसम शुरू हो चुका है, वहीं Cooperative Bank Employees Protest (कर्मचारी आंदोलन) की तैयारी में हैं।
उनका कहना है — “हमें हमारी मेहनत का हक़ चाहिए। अदालत ने आदेश दिया है, पर अफसरों ने पालन नहीं किया।”
अगर स्थिति यही रही, तो बैंक कर्मचारी आंदोलन के लिए बाध्य होंगे — और यह मामला केवल वेतन वृद्धि का नहीं, बल्कि न्यायिक आदेशों की गरिमा से जुड़ा होगा।
“बिना भय के प्रीत नहीं” — न्याय का अर्थ अब डर से भी है
विजय कुमार झा का कहना है — “जब तक अधिकारी कानून से डरेंगे नहीं, तब तक न्याय का कोई अर्थ नहीं रहेगा। Without Fear, No Justice Exists.”
उन्होंने बताया कि एक मामूली क्लर्क को ₹10 की रिश्वत के आरोप में 40 साल न्याय के लिए लड़ना पड़ा।
अब सोचिए, जिस देश में एक कर्मचारी को चार दशक लग जाएं बरी होने में, वहां आम नागरिक का क्या हाल होगा?




