सीजी भास्कर 31 अक्टूबर राज्य सरकार का तर्क — धर्म के आधार पर SIT बनाना संविधान की भावना के खिलाफ
(Maharashtra SIT Case) में महाराष्ट्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले पर पुनर्विचार याचिका दायर की है, जिसमें अकोला दंगे (Akola Violence) से जुड़े मामलों की जांच के लिए हिंदू और मुस्लिम अधिकारियों की (Special Investigation Team) गठित करने का आदेश दिया गया था। सरकार का कहना है कि पुलिस बल को धर्म के आधार पर बांटना न केवल राज्य की धर्मनिरपेक्ष नीति के विपरीत है, बल्कि प्रशासनिक निष्पक्षता को भी कमजोर करता है।
अकोला हिंसा का मामला: अफजल शरीफ की याचिका से शुरू हुआ विवाद
यह पूरा मामला 13 मई 2023 को अकोला में हुई हिंसा से जुड़ा है, जब पैगंबर मोहम्मद से संबंधित एक सोशल मीडिया पोस्ट के बाद दंगे भड़क उठे थे।
मोहम्मद अफजल शरीफ ने अपनी याचिका में कहा था कि उसने एक हिंदू व्यक्ति की हत्या होते देखी थी और जब उसने इसका विरोध किया तो हमलावरों ने उस पर भी हमला किया। उसने पुलिस से शिकायत की, लेकिन (FIR) दर्ज होने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
हाई कोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा मामला
जब पुलिस की जांच से अफजल असंतुष्ट रहा, तो उसने (Bombay High Court) में याचिका दायर की। लेकिन वहां से उसे राहत नहीं मिली।
इसके बाद उसने (Supreme Court) का दरवाजा खटखटाया, जहां जस्टिस संजय कुमार की अध्यक्षता वाली बेंच ने उसकी अपील स्वीकार की और राज्य को निर्देश दिया कि जांच के लिए एक ऐसी (SIT) बनाई जाए जिसमें दोनों समुदायों — हिंदू और मुस्लिम — के सीनियर पुलिस अधिकारी शामिल हों।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों पर महाराष्ट्र सरकार की प्रतिक्रिया
राज्य सरकार ने कहा कि वह कोर्ट के आदेश का पालन करेगी, लेकिन इस फैसले को लेकर अपनी गहरी आपत्ति भी दर्ज कराई। सरकार ने कहा —
“जब कोई अधिकारी पुलिस की वर्दी पहनता है, तो उसकी पहचान केवल कानून और कर्तव्य से होती है। पुलिस अधिकारी का कोई धर्म, जाति या राजनीतिक झुकाव नहीं होता।”
सरकार ने स्पष्ट किया कि (Law Enforcement Integrity) पर आधारित पुलिस सेवा में धार्मिक पहचान को शामिल करना संविधान के धर्मनिरपेक्ष स्वरूप के साथ समझौता होगा।
सरकार का तर्क — धर्मनिरपेक्ष व्यवस्था को कमजोर करता है यह फैसला
महाराष्ट्र सरकार ने अपने जवाब में कहा कि SIT का धर्म के आधार पर गठन करना एक खतरनाक मिसाल साबित हो सकता है।
इससे यह संदेश जाएगा कि प्रशासनिक पदों पर कार्यरत अधिकारी अब धार्मिक पहचान के आधार पर चुने जा सकते हैं, जो संविधान की मूल भावना के खिलाफ है।
राज्य ने इसे (Violation of Secular Principles) बताया और कहा कि ऐसी व्यवस्था पुलिस बल की निष्पक्षता और अखंडता पर सवाल खड़ा करती है।
‘Police Officer Has No Religion’ — महाराष्ट्र सरकार का स्पष्ट संदेश
राज्य का कहना है कि एक पुलिस अधिकारी सिर्फ जनता और कानून के प्रति जवाबदेह होता है।
उसका धर्म, जाति या समुदाय उससे ऊपर नहीं होता।
महाराष्ट्र ने सुप्रीम कोर्ट से अनुरोध किया है कि आदेश पर पुनर्विचार किया जाए और जांच सिर्फ कानून और तथ्यों के आधार पर की जाए, न कि धार्मिक पहचान के आधार पर।





