सीजी भास्कर, 4 दिसंबर। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन से जुड़ा कथित जमीन घोटाला (Land Scam Case Relief) एक बार फिर चर्चा में है, लेकिन इस बार सुर्खियों में अदालत के आदेश की वह लाइन है जिसने पूरे राजनीतिक गलियारे में हलचल पैदा कर दी। हाई कोर्ट ने सोरेन को MP-MLA कोर्ट के सामने व्यक्तिगत पेशी से राहत दे दी है। अब निचली अदालत में उनकी जगह वकील पैरवी कर सकेंगे। इस फैसले ने पूरे मामले की दिशा फिलहाल शांत, लेकिन दिलचस्प मोड़ पर पहुंचा दी है।
कैसे बदला पूरा मामला, जानिए सुनवाई की पूरी कहानी
बुधवार को याचिका पर सुनवाई हुई और अदालत ने 12 दिसंबर को तय की गई अनिवार्य उपस्थिति के आदेश पर रोक लगा दी। याचिका (Land Scam Case Relief) में यह साफ कहा गया था कि सोरेन समन का जवाब भेज चुके हैं, इसलिए हर सुनवाई में व्यक्तिगत उपस्थिति की जरूरत नहीं। अदालत ने तर्कों को स्वीकार किया और राहत प्रदान की। इसे सोरेन की कानूनी टीम के लिए बड़ी जीत माना जा रहा है, क्योंकि अभी तक MP-MLA कोर्ट में उन्हें खुद मौजूद रहने का आदेश था।
ED की शिकायत से शुरू हुआ विवाद
ईडी की ओर से दायर शिकायत पिटीशन में कहा गया था कि लैंड स्कैम से जुड़े मामले में हेमंत सोरेन को 10 बार समन भेजा गया। दावा था कि उन्होंने सिर्फ दो बार जवाब दिया, बाकी को नजरअंदाज किया। पिटीशन दायर होने के बाद निचली अदालत ने व्यक्तिगत पेशी का निर्देश दिया था। यही आदेश हाईकोर्ट तक पहुंचा और फिलहाल के लिए उस पर रोक लग गई।
फैसला क्यों है अहम?
सोरेन के लिए अदालत जाना अब अनिवार्य नहीं
सरकारी ज़िम्मेदारियों के बीच राहत, कानूनी लड़ाई वकीलों पर
आरोप और सुनवाई, दोनों जारी – लेकिन दबाव का स्वरूप बदला
इस आदेश का असर राजनीतिक और कानूनी (Land Scam Case Relief) दोनों स्तर पर बड़ा माना जा रहा है। विपक्ष जहां सवाल उठाता रहा है, वहीं सरकार पक्ष इस राहत को प्रक्रिया के दायरे में न्यायिक मान्यता के रूप में देख रहा है। अगला कदम क्या होगा, यह आगे की कार्रवाई तय करेगी।
मामला अभी खत्म नहीं, बस दिशा बदली है। अदालत की अगली सुनवाई और ED की आगे की रणनीति पर नज़र बनी रहेगी। फिलहाल इतना साफ है कि इस राहत ने सोरेन को कानूनी रूप से मजबूत सांस लेने का मौका दिया है।





