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British Liquor Auction System: ब्रिटिश काल में देसी शराब के ठेके कैसे चलते थे और नीलामी की असली तस्वीर कैसी थी?

By Newsdesk Admin
08/12/2025
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अक्सर कहा जाता है कि अंग्रेजी शासन में सबकुछ कड़े नियमों और अनुशासन से चलता था, लेकिन British Liquor Auction System की पड़ताल करते ही तस्वीर बिल्कुल अलग नज़र आती है। देसी शराब में मिलावट, कम नशा चढ़ने की शिकायतें और अवैध उत्पादन—ये समस्याएं उसी दौर में भी मौजूद थीं। मांग जितनी बढ़ती गई, व्यवस्थाएं उतनी ही लड़खड़ाती रहीं।

Contents
  • महुए–शीरे की भट्ठियां और बढ़ती मांग
  • ठेकों की नीलामी—ब्रिटिश सरकार का प्रमुख राजस्व स्रोत
  • अफीम–गांजा–ताड़ी से होने वाली कमाई
  • अवैध शराब—कम पैमाने पर, लेकिन मौजूद
  • तब और अब—राजस्व में ज़मीन–आसमान का अंतर

महुए–शीरे की भट्ठियां और बढ़ती मांग

सुल्तानपुर के पास रायबरेली रोड स्थित देसी शराब की पुरानी डिस्टिलरी में महुए और शीरे से दारू तैयार की जाती थी। करीब 30 भट्ठियां दिन भर चलने के बावजूद जिले की जरूरतें पूरी नहीं होती थीं। जब प्रतापगढ़ की डिस्टिलरी 1900 में बंद हुई तो वहां की पूरी मांग भी यहीं से पूरी की गई। इसी वजह से शराब की सप्लाई और मांग में भारी अंतर पैदा हुआ, जिससे बाद में “Liquor Supply Gap” प्रशासन के लिए बड़ी चुनौती बन गया।

ठेकों की नीलामी—ब्रिटिश सरकार का प्रमुख राजस्व स्रोत

उन्नीसवीं सदी के अंतिम दशक में देसी शराब के ठेकों की नीलामी शुरू हुई और इसे तेजी से बढ़ते राजस्व का भरोसेमंद साधन माना गया। 1901 में डिस्टिलरी हेड ड्यूटी से जहां 63,000 रुपये मिले, वहीं पूरे जिले के 179 ठेकों की नीलामी से केवल 26,000 रुपये आए। शहर की सबसे महंगी दुकान 1,900 रुपये में नीलाम हुई। अमेठी और गौरीगंज जैसे इलाकों में पासियों की आबादी अधिक होने के कारण वहां के ठेकों को लाभकारी माना जाता था। इसके उलट कादीपुर तहसील में मुख्य दुकान कभी 12 रुपये से ज्यादा में नहीं उठी और कुल आय मुश्किल से 1,000 रुपये तक पहुंच पाती थी।

अफीम–गांजा–ताड़ी से होने वाली कमाई

उस समय ताड़ी भी सरकारी आमदनी का हिस्सा थी, जिससे करीब 450 रुपये सालाना प्राप्त होते थे। 1901 में जिले में 466 सेर अफीम की खपत दर्ज की गई, जिससे 1,570 रुपये की आय हुई। गांजा और चरस की बिक्री के भी उल्लेख मिलते हैं, हालांकि उनकी आय का विस्तार दर्ज नहीं है। प्रशासन इन नशों को वर्ग और जाति आधारित पसंद के रूप में दर्ज करता रहा—गांजा मजबूत जातियों में लोकप्रिय, चरस को गरीब तबकों का नशा, और अफीम कुछ मुसलमानों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला लेकिन सीमित प्रभाव वाला पदार्थ बताया गया।

अवैध शराब—कम पैमाने पर, लेकिन मौजूद

बीसवीं सदी की शुरुआत में “Illegal Brewing Practices” भी पूरी तरह खत्म नहीं थे। अमेठी और गौरीगंज क्षेत्रों में पासियों द्वारा अवैध शराब बनाए जाने का ज़िक्र है, हालांकि इसे राजस्व में बड़ी गिरावट लाने वाला नहीं माना गया। इसके अलावा मुसाफिरखाना, हलियापुर और बल्दीराय क्षेत्रों में अफीम (पोस्ता) की खेती होती थी, जिसे अंग्रेज प्रोत्साहित करते थे। किसानों को एडवांस रकम मिलने और अनुकूल मिट्टी–जलवायु इसकी मुख्य वजह थीं।

तब और अब—राजस्व में ज़मीन–आसमान का अंतर

करीब 120–130 साल पहले शराब, ताड़ी, गांजा और अफीम से जितनी आय होती थी, आज उससे कई गुना ज्यादा राजस्व मिलता है। आजाद भारत में देसी–विदेशी शराब, बीयर और भांग से होने वाली कमाई इस बात की गवाह है कि ब्रिटिश काल में शुरू हुई ठेका व्यवस्था समय के साथ और मजबूत होती चली गई। British Liquor Auction System की वह नींव आज भी सरकारी राजस्व के बड़े हिस्से को प्रभावित करती है।

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