सीजी भास्कर, 12 दिसंबर। तकनीक की दुनिया अब सिर्फ तेज़ इंटरनेट, स्मार्टफोन या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तक सीमित नहीं रही। 2025 में एक नई रेस तेज़ी से उभर रही है—उम्र को रोकने, धीमा करने और शायद हराने की रेस। दिलचस्प बात यह है कि इस दौड़ के अगुआ फार्मा कंपनियां नहीं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े टेक अरबपति हैं।
दिसंबर की शुरुआत में इसी दिशा में भारत से एक बड़ा संकेत मिला, जब दीपिंदर गोयल ने अपने नए प्रयोगात्मक वियरेबल ‘Temple’ की झलक (Tech Billionaires Longevity) दिखाई। दिखने में जेलीबीन जैसा यह सुनहरा पैच असल में एक हाई-टेक डिवाइस है, जो रियल-टाइम में दिमाग में रक्त प्रवाह को ट्रैक करने के लिए तैयार किया गया है। गोयल खुद इसे एक साल से इस्तेमाल कर रहे हैं और मानते हैं कि बुढ़ापा कोई अभिशाप नहीं, बल्कि एक तकनीकी समस्या है—जिसका हल खोजा जा सकता है।
टेक से डीपटेक और अब लंबी उम्र की ओर
फूड डिलीवरी और क्विक कॉमर्स के बाद गोयल का यह कदम संकेत देता है कि टेक लीडर्स अब अगला बड़ा दांव लॉन्गेविटी (Longevity) पर लगा रहे हैं। Eternal जैसी कंपनियों के सीईओ अब सिर्फ बिजनेस स्केल नहीं, बल्कि मानव जीवन की सीमा को चुनौती देने की बात कर रहे हैं।
और गोयल इस दौड़ में अकेले नहीं हैं।
जब साइंस फिक्शन जियो-पॉलिटिक्स बन जाए
100 साल से ज्यादा जीने की चर्चा अब किताबों या फिल्मों तक सीमित नहीं रही। हाल के महीनों में चीन और रूस के शीर्ष नेतृत्व के बीच 150 साल तक जीने को लेकर हुई बातचीत ने यह साफ कर दिया कि लंबी उम्र अब रणनीतिक सोच का हिस्सा बन चुकी है।
बीते एक दशक से सिलिकॉन वैली के दिग्गज इस क्षेत्र में अरबों डॉलर झोंक रहे हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि जहां फार्मा कंपनियां बीमारियों का इलाज ढूंढती हैं, वहीं टेक अरबपति मौत की अवधारणा पर ही सवाल खड़ा कर रहे हैं।
टेक अरबपति बनाम बिग फार्मा
सबसे बड़ा सवाल यही है कि इस क्षेत्र में फार्मा के दिग्गज पीछे क्यों हैं?
जवाब सोच में छुपा है।
टेक उद्यमियों के लिए मौत कोई प्राकृतिक सच्चाई नहीं, बल्कि एक इंजीनियरिंग (Tech Billionaires Longevity) फेल्योर है। मशहूर निवेशक पीटर थील पहले ही कह चुके हैं कि “मौत को प्राकृतिक मान लेना सबसे बड़ी भूल है।”
जिन लोगों ने अरबों यूज़र्स तक पहुंचने वाले सॉफ्टवेयर बनाए, वे अब मानव शरीर, दिमाग और उम्र को भी ऑप्टिमाइज़ किए जाने वाले सिस्टम की तरह देख रहे हैं।
लंबी उम्र पर रिसर्च में दशकों लगते हैं—और यही वह खेल है जहां टेक फाउंडर्स के पास पैसा भी है और सब्र भी।
बेज़ोस से मस्क तक: अरबों का दांव
रिपोर्ट्स के मुताबिक, जेफ बेज़ोस Altos Labs को सपोर्ट कर रहे हैं, जिसका लक्ष्य है सेलुलर रिजुवेनेशन के ज़रिए उम्र से जुड़ी बीमारियों को खत्म करना।
वहीं सबसे ज्यादा चर्चा में है एलन मस्क की Neuralink—एक ब्रेन-इम्प्लांट स्टार्टअप, जिसकी वैल्यू करीब 9 बिलियन डॉलर आंकी जा रही है।
Neuralink सिर्फ मेडिकल ट्रीटमेंट तक सीमित नहीं रहना चाहता। इसका लक्ष्य है कि 2030 तक एक स्वस्थ इंसान में ब्रेन डिवाइस इम्प्लांट किया जाए, जो दिमाग और मशीन के बीच की दूरी खत्म कर सके।
54 लाख करोड़ का भविष्य
विशेषज्ञों का मानना है कि एंटी-एजिंग और लॉन्गेविटी इंडस्ट्री का आकार अब करीब 54 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच चुका है—और यह सिर्फ शुरुआत है।
जहां पहले सवाल था “बीमारी कैसे ठीक करें?”, अब सवाल है—
“उम्र क्यों बढ़े?”
क्या इंसान सच में उम्र को हरा पाएगा?
इसका जवाब फिलहाल भविष्य के गर्भ में है। लेकिन इतना तय है कि टेक अरबपति अब सिर्फ दुनिया बदलना नहीं चाहते— वे ज़िंदगी की सीमा बदलने की कोशिश में हैं।





