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Second Marriage Service Rules : कानून कठोर है पर साफ है, दूसरी शादी पर नौकरी गई, सुप्रीम कोर्ट का फैसला

By Newsdesk Admin 21/12/2025
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Central University Employees Case
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सीजी भास्कर, 21 दिसंबर। पत्नी के रहते दूसरी शादी करने वाले सीआइएसएफ जवान को नौकरी से बर्खास्त करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने पूरी तरह सही ठहराया है। शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश को निरस्त करते हुए केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल की अनुशासनात्मक अथारिटी द्वारा की गई बर्खास्तगी को बहाल कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि सेवा नियमों का उल्लंघन करने वाले कर्मी के प्रति नरमी नहीं बरती जा सकती और पत्नी के रहते दूसरी शादी करना (Second Marriage Service Rules) स्पष्ट कदाचार की श्रेणी में आता है।

न्यायमूर्ति संजय करोल और न्यायमूर्ति विपुल एम पंचोली की पीठ ने केंद्र सरकार की अपील स्वीकार करते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने मामले में हस्तक्षेप कर गंभीर कानूनी भूल की। हाई कोर्ट ने बर्खास्तगी को कदाचार की तुलना में अत्यधिक कठोर दंड मानते हुए सजा कम करने के लिए मामला अनुशासनात्मक प्राधिकारी को वापस भेज दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने इसे गलत ठहराते हुए कहा कि जब नियम स्पष्ट हों, तब अदालतों को अनुशासनात्मक कार्रवाई में अनावश्यक हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।

शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में सीआइएसएफ नियम, 2001 की धारा 18 बी का विशेष रूप से उल्लेख किया। यह धारा स्पष्ट रूप से कहती है कि यदि कोई व्यक्ति अपने जीवित जीवन साथी के रहते किसी अन्य से विवाह करता है, तो वह नियुक्ति के लिए अयोग्य माना जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह प्रावधान केवल नियुक्ति तक सीमित नहीं है, बल्कि सेवा में रहते हुए भी ऐसे आचरण पर दंडात्मक परिणाम लागू करता है। अदालत ने कहा कि पत्नी के रहते दूसरी शादी करना (Second Marriage Service Rules) नियमों के प्रत्यक्ष उल्लंघन के अंतर्गत आता है।

पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि दंडात्मक प्रावधानों की व्याख्या सख्ती से की जानी चाहिए, लेकिन जब कानून के शब्द बिल्कुल स्पष्ट हों, तब किसी प्रकार की नरमी या वैकल्पिक व्याख्या की गुंजाइश नहीं रहती। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस मामले में नियमों में कोई अस्पष्टता नहीं है। इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि आरोपी जवान को किसी तरह का लाभ दिया जाना चाहिए।

अदालत ने अपने फैसले में “ड्यूरा लेक्स सेड लेक्स” सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा कि कानून कठोर हो सकता है, लेकिन वही कानून है। कानून के उल्लंघन से उत्पन्न असुविधा या कठोर परिणाम कानून की वैधता को कमजोर नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुशासनात्मक प्राधिकारी द्वारा की गई कार्रवाई न तो मनमानी है और न ही असंगत।

क्या था मामला

प्रणब कुमार नाथ 22 जुलाई 2006 को सीआइएसएफ में कांस्टेबल के रूप में भर्ती हुए थे। उनकी पत्नी चंदना नाथ ने अधिकारियों को लिखित शिकायत देकर बताया कि प्रणब नाथ ने 14 मार्च 2016 को पार्थना दास से दूसरी शादी कर ली है। शिकायत के बाद विभागीय जांच कराई गई, जिसमें आरोप सही पाए गए। पत्नी के रहते दूसरी शादी करने पर (Second Marriage Service Rules) एक जुलाई 2017 को प्रणब नाथ को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया।

बर्खास्तगी के खिलाफ नाथ ने उच्च न्यायालय का रुख किया, जहां हाई कोर्ट ने दंड को अत्यधिक कठोर मानते हुए सजा कम करने का निर्देश दिया। इस आदेश को केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट का आदेश रद करते हुए बर्खास्तगी को पूरी तरह वैध ठहराया और अनुशासनात्मक प्राधिकारी के निष्कर्षों को बहाल कर दिया।

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