Bangladesh Media Attack : बांग्लादेश की राजधानी में हालिया घटनाओं ने यह साफ कर दिया है कि अब मीडिया संस्थान भी हिंसा से अछूते नहीं रहे। भीड़ द्वारा किए गए हमलों में दफ्तरों को नुकसान पहुंचाया गया, आगजनी हुई और कई पत्रकारों को घंटों तक जान बचाने के लिए इमारतों के भीतर छिपना पड़ा। हालात ऐसे बन गए कि रिपोर्टिंग से पहले अपनी सुरक्षा की चिंता करना अब पत्रकारों की मजबूरी बनती जा रही है।
हमले के वक्त कई मीडियाकर्मी बाहर निकलने का मौका तक नहीं पा सके। धुएं और अफरातफरी के बीच कुछ लोग छतों पर फंस गए, जहां से उन्हें बचाने में राहत दलों को कड़ी मशक्कत करनी पड़ी। यह हमला किसी एक खबर या लेख के विरोध में नहीं था, बल्कि सीधे उन लोगों को निशाना बनाया गया जो सवाल पूछने का साहस रखते हैं।
घटना के बाद अंतरिम प्रशासन ने कार्रवाई की बात कही और कुछ लोगों को हिरासत में लिया गया। हमलावरों की ओर से मीडिया पर विदेशी हितों के पक्ष में काम करने जैसे आरोप लगाए गए, जिससे माहौल और ज्यादा तनावपूर्ण हो गया। राजनीतिक बयानबाज़ी और अविश्वास के बीच मीडिया खुद को दो पाटों के बीच फंसा हुआ महसूस कर रहा है।
इस उथल-पुथल की जड़ में हालिया राजनीतिक हत्या और उसके बाद फैला आक्रोश बताया जा रहा है। देशभर में विरोध प्रदर्शन तेज हुए, जिनका असर सीधे मीडिया और कमजोर समुदायों पर पड़ा। कई इलाकों में हालात ऐसे बने कि कानून व्यवस्था संभालना भी चुनौती बन गया।
लगातार हो रहे हमलों ने यह कड़वा सच सामने रखा है कि बांग्लादेश में पत्रकारिता अब केवल सच लिखने का पेशा नहीं रह गई है। यहां अभिव्यक्ति की आज़ादी से पहले जीवन की सुरक्षा सबसे बड़ा सवाल बन चुकी है। अगर हालात नहीं बदले, तो यह संकट केवल मीडिया तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की जड़ों को भी कमजोर कर सकता है।





