सीजी भास्कर, 24 मार्च। Atal Bihari Vajpayee Vishwavidyalaya में ‘खाद्य हानि एवं बर्बादी’ पर आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का समापन एक मजबूत सामाजिक संदेश (ABVV Bilaspur Conference) के साथ हुआ-अन्न को सिर्फ उपभोग की वस्तु नहीं, बल्कि जिम्मेदारी मानने की जरूरत है।
छत्तीसगढ़ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी परिषद के सहयोग से आयोजित इस आयोजन में देशभर से आए विशेषज्ञों, शोधकर्ताओं और विद्यार्थियों ने भाग लेकर खाद्य सुरक्षा, संसाधन प्रबंधन और सतत विकास पर गंभीर चर्चा की।
समाधान तकनीक नहीं, सोच में बदलाव
संगोष्ठी की अध्यक्षता करते हुए कुलगुरु डॉ. ए.डी.एन. वाजपेयी ने स्पष्ट कहा कि खाद्य संकट का असली समाधान केवल नई तकनीक में नहीं, बल्कि हमारी जीवनशैली और सोच में बदलाव में छिपा है।
उन्होंने भारतीय परंपरा के ‘अन्नं ब्रह्म’ सिद्धांत का उल्लेख करते (ABVV Bilaspur Conference) हुए कहा कि जब तक समाज अन्न को सम्मान नहीं देगा, तब तक बर्बादी रोकना मुश्किल रहेगा।
‘वेस्ट टू वेल्थ’ मॉडल बना चर्चा का केंद्र
कार्यक्रम में ‘सर्कुलर इकोनॉमी’ और ‘वेस्ट टू वेल्थ’ जैसे कॉन्सेप्ट्स पर खास जोर दिया गया। संयोजक रेवा कुलश्रेष्ठ ने बताया कि खाद्य अपशिष्ट को सही तरीके से उपयोग में लाकर जैविक खाद, बायो-एनर्जी और अन्य उपयोगी उत्पाद तैयार किए जा सकते हैं।
इससे न केवल पर्यावरण को लाभ मिलेगा, बल्कि आर्थिक अवसर भी पैदा होंगे।
आधुनिक तकनीक से घटेगी खाद्य हानि
मुख्य अतिथि डॉ. एस.एस. सेंगर ने फसल कटाई के बाद होने वाली क्षति को कम करने के लिए कोल्ड चेन, स्मार्ट स्टोरेज और आधुनिक तकनीकों को अपनाने की जरूरत बताई।
वहीं कुलसचिव डॉ. तर्णीश गौतम ने कहा कि खाद्य बर्बादी को केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी के रूप में देखने की जरूरत है।
65 शोध पत्रों में सामने आए नए समाधान
विभागाध्यक्ष डॉ. यशवंत कुमार पटेल के अनुसार, संगोष्ठी में देशभर से कुल 65 शोध पत्र प्रस्तुत (ABVV Bilaspur Conference) किए गए। इन शोधों में खाद्य अपशिष्ट प्रबंधन के वैज्ञानिक, नीतिगत और व्यावहारिक पहलुओं पर महत्वपूर्ण सुझाव सामने आए।
समाज के लिए स्पष्ट संदेश
कार्यक्रम के अंत में सह-आयोजक डॉ. सौमित्र तिवारी ने सभी प्रतिभागियों का आभार जताया। संगोष्ठी ने यह स्पष्ट कर दिया कि यदि समाज और तकनीक साथ आएं, तो खाद्य बर्बादी को काफी हद तक रोका जा सकता है।
यह आयोजन केवल शैक्षणिक विमर्श नहीं रहा, बल्कि हर व्यक्ति को यह सोचने पर मजबूर कर गया कि थाली में बचा हर दाना, एक संसाधन है – जिसकी कीमत समझना जरूरी है।


