सीजी भास्कर, 15 अप्रैल : मानसून की बारिश (El Nino Effect 2026) किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं होती, लेकिन कभी-कभी दूर प्रशांत महासागर में बनने वाली एक मौसमी घटना ‘अल नीनो’ इस पूरे सिस्टम को प्रभावित कर देती है। साल 2026 में अल नीनो के विकसित होने की संभावना मजबूत मानी जा रही है, जिससे इस बार मॉनसून कमजोर पड़ सकता है। मौसम वैज्ञानिकों के अनुसार, यह स्थिति भारत में सामान्य से कम बारिश का कारण बन सकती है और इसका सीधा असर खेती-किसानी और जल संसाधनों पर पड़ेगा।
अल नीनो एक प्राकृतिक मौसमी घटना है, जो प्रशांत महासागर (Pacific Ocean) के मध्य और पूर्वी हिस्से में विकसित होती है। इस दौरान समुद्र के पानी का तापमान सामान्य से अधिक हो जाता है। आमतौर पर समुद्र का पानी ठंडा रहता है, लेकिन अल नीनो की स्थिति में तापमान 0.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाता है। यह बदलाव वैश्विक मौसम चक्र को प्रभावित करता है और मॉनसून की हवाओं को कमजोर कर देता है, जिससे भारत में वर्षा की मात्रा घट जाती है।
अल नीनो बनने की प्रक्रिया भी काफी दिलचस्प है। सामान्य परिस्थितियों में पूर्वी प्रशांत (पेरू के पास) का पानी ठंडा होता है और ट्रेड विंड्स पूर्व से पश्चिम की ओर बहती हैं, जो गर्म पानी को इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया की दिशा में धकेलती हैं। लेकिन अल नीनो के दौरान ये हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं या कभी-कभी उल्टी दिशा में बहने लगती हैं। इसके कारण गर्म पानी पूर्वी प्रशांत में ही जमा हो जाता है और वायुमंडलीय दबाव में बदलाव आता है, जिससे बादलों और बारिश का पैटर्न बिगड़ जाता है। यही कारण है कि (El Nino Effect 2026) के समय भारत में मॉनसून की शुरुआत में देरी और बारिश में कमी देखी जाती है।
भारत का दक्षिण-पश्चिम मॉनसून जून से सितंबर के बीच सक्रिय रहता है और अरब सागर व बंगाल की खाड़ी से नमी लेकर पूरे देश में वर्षा करता है। लेकिन अल नीनो इस पूरी प्रक्रिया को कमजोर कर देता है। इसके प्रभाव से मॉनसूनी हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, बारिश शुरू होने में देरी हो सकती है और कई क्षेत्रों में सामान्य से कम वर्षा होती है। खासकर उत्तर-पश्चिम और मध्य भारत में इसका असर ज्यादा देखने को मिलता है, जहां सूखे जैसी स्थिति बन सकती है।
अल नीनो का असर सिर्फ बारिश तक सीमित नहीं रहता, बल्कि तापमान पर भी इसका प्रभाव पड़ता है। कम बादल बनने के कारण गर्मी बढ़ जाती है और हीटवेव की स्थिति पैदा हो सकती है। पहले भी 2002, 2009 और 2015 जैसे वर्षों में अल नीनो के कारण भारत में कम बारिश और सूखे जैसे हालात बने थे।
वर्तमान स्थिति की बात करें तो ला नीना कमजोर हो रहा है और अप्रैल 2026 में ENSO न्यूट्रल स्थिति बनी हुई है। हालांकि मई से जुलाई के बीच अल नीनो के विकसित होने की संभावना जताई जा रही है। भारतीय मौसम विभाग (IMD) और स्काईमेट जैसी एजेंसियां भी 2026 में सामान्य से कम मॉनसून का अनुमान लगा रही हैं। यह स्थिति (El Nino Effect 2026) कृषि क्षेत्र के लिए चिंता बढ़ाने वाली हो सकती है।
कृषि पर इसके प्रभाव की बात करें तो खरीफ फसलें जैसे धान, मक्का और सोयाबीन सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। पानी की कमी के कारण उत्पादन घट सकता है, जिससे किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसके अलावा, बांधों में जलस्तर कम होने से सिंचाई और बिजली उत्पादन पर भी असर पड़ता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अल नीनो और ला नीना जैसी घटनाएं और अधिक प्रभावशाली होती जा रही हैं। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से इनके प्रभाव में तीव्रता बढ़ रही है, जिससे भविष्य में मौसम की अनिश्चितता और बढ़ सकती है।




