सीजी भास्कर, 30 मई : छत्तीसगढ़ के फेफड़े कहे जाने वाले और जैव विविधता से समृद्ध हसदेव अरण्य क्षेत्र (CG Hasdeo Forest Controversy) में एक बार फिर पेड़ों की कटाई को लेकर सियासी गलियारों में एक ऐसा बड़ा राजनीतिक भूचाल आया है, जिसने सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष तक के तेवर आक्रामक कर दिए हैं। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस के कद्दावर नेता भूपेश बघेल ने हसदेव अरण्य में बड़े पैमाने पर लाखों पेड़ों की कटाई की मंजूरी को लेकर केंद्र की मोदी सरकार और राज्य की साय सरकार पर सीधा और बेहद तीखा हमला बोला है।
उन्होंने आरोप लगाया कि जब हसदेव के प्राचीन और पवित्र जंगलों का बेरहमी से कत्लेआम किया जा रहा है, तब राज्य सरकार रहस्यमयी रूप से मौन धारण किए बैठी है। इस गंभीर बयान और बढ़ते सस्पेंस के बाद (CG Hasdeo Forest Controversy) को लेकर पूरे प्रदेश की राजनीति का पारा अचानक सातवें आसमान पर पहुंच गया है, क्योंकि हसदेव की यह जंग आदिवासियों के अस्तित्व और पर्यावरण से जुड़ी हुई है।
दरअसल, यह पूरा मामला केवल पेड़ों को काटने का नहीं है, बल्कि कॉरपोरेट घरानों और रसूखदारों को लाभ पहुंचाने की एक बहुत बड़ी और सोची-समझी क्रोनोलॉजी का हिस्सा माना जा रहा है। राजधानी रायपुर में मीडिया से कड़े लहजे में चर्चा करते हुए भूपेश बघेल ने एक बड़ा सनसनीखेज दावा किया। उन्होंने कहा कि हसदेव अरण्य क्षेत्र के परसा ईस्ट और केते बासेन कोल ब्लॉक के विस्तार के नाम पर करीब 7 लाख से अधिक पेड़ों की कटाई की गुप्त अनुमति दे दी गई है, लेकिन छत्तीसगढ़ की सरकार इस भयानक विनाश पर पूरी तरह आंखें मूंदे बैठी है।
उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर क्यों छत्तीसगढ़ की अमूल्य प्राकृतिक संपदा और आदिवासियों की जमीनों को उद्योगपतियों के हवाले किया जा रहा है? सरकार के इस रुख के खिलाफ कड़ा कदम (CG Hasdeo Forest Controversy) उठाने का आह्वान करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री ने जनता को इस विनाश के खिलाफ जागने की अपील की है।
यह तो अफसरों और मंत्रियों की आपसी गैंगवॉर है!
भूपेश बघेल का गुस्सा केवल हसदेव के जंगलों तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने राज्य सरकार द्वारा जोर-शोर से मनाए जा रहे ‘सुशासन तिहार’ (Good Governance Festival) अभियान की भी जमकर धज्जियां उड़ा दीं। उन्होंने अधिकारियों और सत्तापक्ष को आईना दिखाते हुए कहा कि छत्तीसगढ़ में आज सुशासन नहीं, बल्कि पूरी तरह कुशासन और प्रशासनिक अराजकता का दौर चल रहा है।
उन्होंने आरोप लगाया कि प्रदेश में इस वक्त मंत्रियों, सांसदों और आईएएस-आईपीएस अधिकारियों के बीच जिस तरह की गुटबाजी, वर्चस्व की लड़ाई और खुलेआम टकराव की खबरें सामने आ रही हैं, उससे यह साफ हो गया है कि मुख्यमंत्री का अपनी ही कैबिनेट और ब्यूरोक्रेसी पर से नियंत्रण पूरी तरह खत्म हो चुका है। इस प्रशासनिक विफलता और सरकार की आपसी कलह से जनता को होने वाले नुकसान (CG Hasdeo Forest Controversy) की सुध लेने वाला आज कोई नहीं है।
पूर्व मुख्यमंत्री ने तंज कसते हुए कहा कि जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं और सरकार के नुमाइंदे आपस में ही मलाईदार विभागों के लिए लड़ रहे हों, तो आम जनता की बुनियादी समस्याओं का समाधान कौन करेगा? उन्होंने साय सरकार पर आरोप लगाया कि वह पूरी तरह से राजनीतिक प्रतिशोध और अपने निजी और कॉरपोरेट आकाओं के हितों को साधने में व्यस्त है, जबकि प्रदेश की कानून-व्यवस्था व विकास कार्य पूरी तरह वेंटिलेटर पर पहुंच चुके हैं। प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव (CG Hasdeo Forest Controversy) करने के झूठे वादे कर सत्ता में आई यह सरकार अब केवल फाइलों और विज्ञापनों में ही सुशासन का ढिंढोरा पीट रही है, जबकि जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल उलट बेहद खौफनाक और चिंताजनक है।
हसदेव को लेकर विपक्ष ने तय किया नया नियम
हसदेव अरण्य का यह पेचीदा मुद्दा अब एक बार फिर छत्तीसगढ़ की राजनीति का सबसे बड़ा और संवेदनशील केंद्र बिंदु बन चुका है। बस्तर से लेकर सरगुजा तक के आदिवासी संगठन और पर्यावरणविद इस कटाई के विरोध में पहले से ही लामबंद हैं, और अब मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने इस आग में घी डालने का काम कर दिया है। भूपेश बघेल ने चेतावनी भरे लहजे में कहा कि हसदेव के जंगलों को बचाना केवल आदिवासियों की नहीं, बल्कि छत्तीसगढ़ के अस्तित्व की लड़ाई है। उन्होंने साफ कर दिया कि जल-जंगल-जमीन की लूट को रोकने के लिए विपक्ष अब विधानसभा से लेकर सड़क तक एक नया नियम (CG Hasdeo Forest Controversy) तय करने जा रहा है, जिसके तहत कॉरपोरेट परस्त नीतियों का पुरजोर और उग्र विरोध किया जाएगा।
अब सबसे बड़ा सस्पेंस और राजनीतिक चुनौती यह है कि विपक्ष के इस चौतरफा और आक्रामक हमले के बाद क्या राज्य सरकार अपनी रहस्यमयी चुप्पी तोड़ेगी? क्या 7 लाख पेड़ों की कटाई के इस फैसले पर रोक लगाई जाएगी या फिर भारी पुलिस बल की तैनाती कर आदिवासियों की आवाज़ को बंदूकों के दम पर दबा दिया जाएगा? बहरहाल, पूर्व मुख्यमंत्री के इस तीखे बयान ने साय सरकार की मुश्किलें जरूर बढ़ा दी हैं। आने वाले दिन छत्तीसगढ़ की सियासत और पर्यावरण की रक्षा के दृष्टिकोण से बेहद नाजुक होने वाले हैं, जहां जनता का यह आक्रोश और आंदोलन की गति (CG Hasdeo Forest Controversy) ही तय करेगी कि हसदेव के ये बेशकीमती जंगल सुरक्षित बच पाते हैं या फिर कोयले की कालिख के नीचे दफन हो जाते हैं।




