सीजी भास्कर, 21 मई : छत्तीसगढ़ के बहुचर्चित डिस्ट्रिक्ट मिनरल फाउंडेशन (डीएमएफ) घोटाला मामले (Chhattisgarh DMF Scam) में छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने घोटाले के मुख्य आरोपियों में से एक और कमीशन एजेंट की भूमिका निभाने वाले रायपुर के व्यवसायी सतपाल सिंह छाबड़ा की नियमित (स्थायी) जमानत याचिका को सिरे से खारिज कर दिया है। जस्टिस की सिंगल बेंच ने अपने फैसले में आर्थिक अपराधों पर बेहद तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि आर्थिक अपराध जानबूझकर केवल व्यक्तिगत फायदे के लिए किए जाते हैं, जिसका सबसे घातक असर देश की अर्थव्यवस्था और देशहित पर पड़ता है। कोर्ट ने साफ किया कि चूंकि इस मामले की जांच राज्य की जांच एजेंसियां कर रही हैं, इसलिए मामले की गंभीरता को देखते हुए याचिकाकर्ता की कस्टडी बेहद जरूरी है।
पूर्व आईएएस अनिल टुटेजा के साथ मिलकर रचने का आरोप
भ्रष्टाचार निवारण ब्यूरो (एसीबी) और आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (ईओडब्ल्यू) ने सतपाल सिंह छाबड़ा को डीएमएफ फंड का सुनियोजित तरीके से दुरुपयोग करने, भ्रष्टाचार करने और मनी लॉन्ड्रिंग के आरोपों में गिरफ्तार किया है। ईओडब्ल्यू की जांच रिपोर्ट के अनुसार, छाबड़ा ने सरकारी सामग्री की खरीदी और आपूर्ति से जुड़ी गड़बड़ियों में एक मुख्य बिचौलिये (मिडिलमैन) और कमीशन एजेंट के तौर पर काम किया है।
याचिकाकर्ता ने डीएमएफ से जुड़ी कृषि संबंधी कल्याणकारी योजनाओं के तहत होने वाली सरकारी खरीद और सप्लाई में भारी अनियमितताएं कीं। विभागीय पूछताछ और जांच के दौरान आरोपी छाबड़ा ने यह स्वीकार किया है कि वह वर्ष 2019 से कृषि विभाग में सरकारी सप्लाई के कार्यों को प्रभावित करने में सक्रिय रूप से शामिल था। जांच में यह भी सामने आया कि मंदीप चावला उर्फ मैडी नाम के व्यक्ति ने उससे संपर्क किया था, जिसने पूर्व आईएएस अधिकारी अनिल टुटेजा के रसूख और प्रभाव का इस्तेमाल कर विभाग से बड़े काम (सप्लाई ऑर्डर्स) दिलाने का सौदा किया था।
विक्रेताओं से वसूलते थे 30 से 35 फीसदी तक मोटा कमीशन
सरकारी दस्तावेज और ईओडब्ल्यू (Chhattisgarh DMF Scam) के आरोपों के मुताबिक, सतपाल सिंह छाबड़ा ने रेट कॉन्ट्रैक्ट विक्रेताओं (वेंडर्स) को कृषि और बागवानी जैसे महत्वपूर्ण सरकारी विभागों से जोड़ने वाले एक सिंडिकेट एजेंट के रूप में काम किया। वह अधिकारियों के संरक्षण में मोटे कमीशन के बदले निजी कंपनियों को सरकारी आपूर्ति के आदेश (सप्लाई ऑर्डर्स) दिलाता था।
आरोप है कि इसके एवज में वेंडर्स से 30 प्रतिशत से लेकर 35 प्रतिशत तक का भारी-भरकम अवैध कमीशन वसूला जाता था। इस काली कमाई का करीब 10 प्रतिशत हिस्सा सिंडिकेट के शीर्ष स्तर पर बैठे लोगों और अधिकारियों को भेजा जाता था, जबकि बाकी का 20 से 25 प्रतिशत हिस्सा सतपाल सिंह छाबड़ा और मंदीप चावला आपस में बांट लेते थे। हालांकि, तकनीकी रूप से यह काम ‘रेट कॉन्ट्रैक्ट टेंडर प्रक्रिया’ के तहत आधिकारिक तौर पर दिया गया था, लेकिन जमीनी स्तर पर वास्तविक काम का आवंटन पूरी तरह इन दलालों और एजेंटों के इशारे पर ही किया गया था। वेंडर्स को भी काम पाने और अपने बिल पास कराने के एवज में यह कमीशन देने के लिए मजबूर किया जाता था।
जमानत याचिका पर हाई कोर्ट की बड़ी टिप्पणी
हाई कोर्ट ने नियमित जमानत (Chhattisgarh DMF Scam) याचिका को नामंजूर करते हुए अपने लिखित आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि आर्थिक अपराधों को सामान्य अपराधों की श्रेणी में रखकर उदारतापूर्वक नहीं देखा जा सकता। इस तरह के अपराध समाज और देश के विकास को सीधे तौर पर बाधित करते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में जहां जांच जारी हो और कड़ियों को जोड़ना बाकी हो, वहां मुख्य आरोपियों को जेल से बाहर भेजना न्यायसंगत नहीं होगा। इस फैसले के बाद अब आरोपी व्यवसायी को फिलहाल जेल में ही रहना होगा।



