सीजी भास्कर, 09 जून : विपक्षी गठबंधन INDIA की बैठक में एक ओर जहां कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (Congress vs TMC) के नेताओं ने एकजुटता का प्रदर्शन किया, वहीं दूसरी ओर पश्चिम बंगाल की राजनीति में दोनों दलों के बीच जारी टकराव ने कांग्रेस की रणनीति पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि कांग्रेस ममता बनर्जी के साथ राष्ट्रीय स्तर पर दोस्ती निभा रही है, लेकिन बंगाल में उसी ममता सरकार के खिलाफ सबसे मुखर विपक्ष की भूमिका भी निभा रही है।
दिल्ली में आयोजित INDIA ब्लॉक की बैठक में सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की गर्मजोशी से मुलाकात की तस्वीरें सामने आईं। बैठक में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे, राहुल गांधी, अखिलेश यादव समेत विपक्षी दलों के कई प्रमुख नेता मौजूद थे। तस्वीरों ने विपक्षी एकता का संदेश जरूर दिया, लेकिन बंगाल की सियासत का सच इससे बिल्कुल अलग दिखाई देता है।
बंगाल में कांग्रेस का सबसे बड़ा निशाना बनीं ममता
पश्चिम Bengal में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (Congress vs TMC) के रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं। 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी ने साफ कर दिया था कि उनकी पार्टी राज्य में अकेले चुनाव लड़ेगी और कांग्रेस के साथ किसी तरह का गठबंधन नहीं करेगी। इसके बाद दोनों दलों के बीच राजनीतिक दूरी और बढ़ गई।
चुनावी अभियान के दौरान राहुल गांधी और कांग्रेस नेताओं ने ममता सरकार पर भ्रष्टाचार, लोकतांत्रिक संस्थाओं के दुरुपयोग और भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने जैसे गंभीर आरोप लगाए थे। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी तो लगातार ममता सरकार के सबसे बड़े आलोचक बने रहे।
राहुल गांधी ने भी उठाए थे सवाल
पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान राहुल गांधी ने कई सभाओं में सीधे ममता बनर्जी को निशाने पर लिया था। उन्होंने कहा था कि विपक्षी नेताओं पर लगातार कार्रवाई होती है, लेकिन ममता बनर्जी के खिलाफ वैसी स्थिति क्यों नहीं दिखाई देती। राहुल गांधी ने यह भी आरोप लगाया था कि भाजपा और तृणमूल कांग्रेस कई मुद्दों पर एक-दूसरे को राजनीतिक लाभ पहुंचाती रही हैं। यानी जिस ममता बनर्जी के साथ कांग्रेस दिल्ली में विपक्षी एकता का मंच साझा करती है, उसी ममता के खिलाफ बंगाल में सबसे तीखे राजनीतिक हमले भी कांग्रेस ही करती है।
आखिर क्यों बदला कांग्रेस का रुख?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस (Congress vs TMC) की यह रणनीति पूरी तरह राजनीतिक मजबूरी से जुड़ी है। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ मजबूत विपक्षी मोर्चा बनाए रखने के लिए कांग्रेस को ममता बनर्जी जैसे क्षेत्रीय दलों की जरूरत है। लेकिन पश्चिम बंगाल में कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस दोनों एक ही राजनीतिक जमीन और वोट बैंक के लिए संघर्ष कर रहे हैं। यही वजह है कि दिल्ली में दोनों दल सहयोगी नजर आते हैं, जबकि बंगाल में एक-दूसरे के खिलाफ चुनावी मैदान में उतरते हैं।
ममता भी कांग्रेस पर साधती रही हैं निशाना
यह भी सच है कि ममता बनर्जी ने कई बार कांग्रेस नेतृत्व पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा चुनाव के बाद उन्होंने विपक्षी गठबंधन के नेतृत्व को लेकर कांग्रेस की क्षमता पर टिप्पणी की थी। कई मौकों पर उन्होंने कांग्रेस को अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की सलाह भी दी। हालांकि भाजपा विरोधी मुद्दों पर दोनों दल अक्सर एक मंच पर दिखाई देते हैं। महिला आरक्षण, परिसीमन और संवैधानिक संस्थाओं से जुड़े कई विषयों पर कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का रुख समान रहा है।
विपक्षी राजनीति की सबसे बड़ी विडंबना
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस का रिश्ता आज भारतीय विपक्ष की सबसे बड़ी राजनीतिक विडंबना बन चुका है। दिल्ली में दोनों दल भाजपा के खिलाफ साझेदार हैं, लेकिन बंगाल में एक-दूसरे को कमजोर करने की पूरी कोशिश करते हैं।
इसी कारण विपक्षी एकता की तस्वीर और जमीनी राजनीति के बीच बड़ा अंतर दिखाई देता है। आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि 2029 की तैयारी के बीच कांग्रेस और ममता बनर्जी का यह “साथ भी, संघर्ष भी” वाला रिश्ता किस दिशा में आगे बढ़ता है।



