सीजी भास्कर, 21 जून। बाजारों से लेकर मोहल्लों की बैठकों तक अब एक बदलाव साफ दिखाई देने (Digital Payments) लगा है। जहां कभी महिलाओं की बचत अलमारी, संदूक या साड़ी की तहों में छिपी रहती थी, वहीं अब वही रकम मोबाइल की स्क्रीन पर दर्ज दिखाई दे रही है। घरों के भीतर पैसों को संभालने का तरीका धीरे धीरे बदल रहा है और इसकी चर्चा भी बढ़ने लगी है।
हाल के वर्षों में लोगों ने यह महसूस किया है कि महिलाएं अब सिर्फ खर्च का हिसाब रखने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अपने पैसों का संचालन भी खुद कर रही हैं। भुगतान करना हो, बचत करनी हो या किसी को रकम भेजनी हो, स्मार्टफोन ने उनके हाथ में एक नया भरोसा दे दिया है।
नोएडा की रहने वाली 58 वर्षीय सुमी राय इसका एक उदाहरण हैं। कुछ समय पहले तक वे नकद पैसे साथ रखती थीं या जरूरत पड़ने पर परिवार के किसी सदस्य की मदद लेती थीं। अब वे खुद यूपीआई के जरिए भुगतान करती हैं। हाल ही में उन्होंने एक रेस्तरां में क्यूआर कोड स्कैन कर अपनी मासिक किटी की राशि जमा की। उनका कहना है कि वे आर्थिक रूप से अधिक आत्मनिर्भर महसूस करना चाहती थीं। परिवार को समझाने के बाद उन्होंने अपने फोन में भुगतान ऐप का उपयोग शुरू किया।
तेजी से बढ़ी डिजिटल पहुंच : Digital Payments
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण एनएफएचएस 6 के आंकड़े बताते हैं कि 2023 से 24 के दौरान देश में 64.3 प्रतिशत महिलाओं ने इंटरनेट का उपयोग किया। इससे पहले 2019 से 21 के सर्वेक्षण में यह आंकड़ा 33.3 प्रतिशत था।
इसी अवधि में अपना बैंक खाता स्वयं संचालित करने वाली महिलाओं की हिस्सेदारी 78.6 प्रतिशत से बढ़कर 89 प्रतिशत हो गई। वहीं अपना मोबाइल फोन रखने और उसका स्वतंत्र रूप से उपयोग करने वाली महिलाओं का अनुपात 53.9 प्रतिशत से बढ़कर 63.6 प्रतिशत तक पहुंच गया।
बदल रहा है पैसे संभालने का तरीका
इन आंकड़ों से साफ होता है कि यह बदलाव केवल तकनीक तक सीमित नहीं है। लंबे समय तक महिलाएं नकद रकम, गहनों या अनौपचारिक बचत के तरीकों से घर की आर्थिक व्यवस्था संभालती थीं। अब धीरे धीरे वही जिम्मेदारी मोबाइल आधारित लेनदेन की ओर बढ़ रही है।
दिल्ली की 33 वर्षीय होम कुक शिखा दत्ता सेन की आय सीधे बैंक खाते में आती है। वे हर महीने बिजली बिल का भुगतान करती हैं, माता पिता को पैसे भेजती हैं, बैंकिंग ऐप के जरिए खर्च का रिकॉर्ड देखती हैं और म्यूचुअल फंड की एसआईपी में निवेश भी करती हैं। पहले परिवार की आर्थिक जिम्मेदारियां उनके पिता और बाद में पति देखते थे, लेकिन अब वे खुद अपनी आय और बचत पर नजर रखती हैं।
छोटे कारोबारों को भी मिला फायदा
यह परिवर्तन छोटे व्यवसाय चला रही महिलाओं में भी दिखाई दे रहा है। ग्रेटर नोएडा की 29 वर्षीय सिलाई उद्यमी रूमी कौर बताती हैं कि डिजिटल भुगतान ने निजी और कारोबारी पैसों को अलग रखने में काफी मदद की है।
ग्राहक अब बड़ी संख्या में क्यूआर कोड के माध्यम से भुगतान कर रहे हैं। इससे आमदनी का रिकॉर्ड तैयार होता है और जरूरत पड़ने पर छोटे ऋण के लिए अपनी आय साबित करना भी आसान हो जाता है। जो पैसा पहले नकद रूप में रखा रहता था, अब उसका पूरा हिसाब उपलब्ध रहता है।
आर्थिक स्वतंत्रता को मिल रही मजबूती
विशेषज्ञ मानते हैं कि वित्तीय समावेशन का अर्थ केवल बैंक खाता खुलवाना (Digital Payments) नहीं है। इसका बड़ा उद्देश्य महिलाओं को अपने धन पर अधिक सुरक्षा, गोपनीयता और नियंत्रण देना है।
अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जब महिलाओं को वित्तीय सेवाओं तक सीधी पहुंच मिलती है तो वे बचत बढ़ाने, नए अवसरों में निवेश करने और बच्चों की पढ़ाई पर अधिक खर्च करने की स्थिति में आती हैं। इससे परिवारों के भीतर आर्थिक निर्णयों में उनकी भागीदारी भी मजबूत होती है।
शिखा दत्ता सेन का कहना है कि उनके पति इस बदलाव का समर्थन करते हैं। उनके अनुसार आर्थिक स्वतंत्रता परिवार पर बोझ नहीं बढ़ाती बल्कि जिम्मेदारियों को साझा करने में मदद करती है।
अभी बाकी है अगला पड़ाव
हालांकि यह बदलाव पूरी तरह से पूरा नहीं हुआ है। डिजिटल सुविधाओं तक पहुंच बढ़ी है, लेकिन उनका नियमित उपयोग अभी भी अपेक्षाकृत कम है।
उद्योग जगत के अनुसार डिजिटल भुगतान करने वाले कुल उपयोगकर्ताओं में महिलाओं की हिस्सेदारी अभी भी सीमित (Digital Payments) है। पिछले वर्ष एनपीसीआई के अधिकारियों ने बताया था कि भुगतान करने वाले सक्रिय उपयोगकर्ताओं में महिलाओं का अनुपात लगभग एक चौथाई के आसपास है। यह दर्शाता है कि वित्तीय सेवाओं तक पहुंच और उनके नियमित उपयोग के बीच अभी भी एक अंतर मौजूद है।
फिलहाल एनएफएचएस 6 के आंकड़े यह संकेत देते हैं कि महिलाओं को डिजिटल वित्तीय व्यवस्था से जोड़ने की दिशा में देश ने महत्वपूर्ण प्रगति की है। अब अगली चुनौती इस जुड़ाव को भरोसे, आत्मविश्वास और रोजमर्रा के इस्तेमाल में बदलने की है।





