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ED Supreme Court Petition : बंगाल में सियासी टकराव तेज, ED सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंची—ममता सरकार पर FIR की मांग

By Newsdesk Admin
13/01/2026
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CJI Dipak Misra Case
CJI Dipak Misra Case

सीजी भास्कर, 13 जनवरी। पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर बड़े संवैधानिक टकराव की ओर बढ़ती दिखाई दे रही है। राज्य में सत्तारूढ़ दल से जुड़े राजनीतिक (ED Supreme Court Petition) घटनाक्रम के बीच प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने असाधारण कदम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है। मामला उस तलाशी अभियान से जुड़ा है, जिसने न सिर्फ राज्य की राजनीति में हलचल मचा दी, बल्कि केंद्र और राज्य के बीच अधिकारों की लड़ाई को भी नए स्तर पर पहुंचा दिया।

Contents
  • 2,742 करोड़ के कोयला मामले से जुड़ा विवाद
  • ED की याचिका में क्या कहा गया?
  • जांच एजेंसी का आरोप: राज्य तंत्र ने रोकी कार्रवाई
  • कलकत्ता हाईकोर्ट में भी चल रही कानूनी जंग
  • क्या दर्ज होगी FIR?
  • सियासत से आगे संवैधानिक सवाल

ईडी ने शीर्ष अदालत में दो अलग-अलग याचिकाएं दाखिल कर पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री, राज्य पुलिस के शीर्ष अधिकारियों और अन्य के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराने की अनुमति मांगी है। एजेंसी का दावा है कि वैधानिक जांच में जानबूझकर हस्तक्षेप किया गया।

2,742 करोड़ के कोयला मामले से जुड़ा विवाद

प्रवर्तन निदेशालय के अनुसार, यह पूरा घटनाक्रम 2,742 करोड़ रुपये के कथित कोयला तस्करी घोटाले की जांच से जुड़ा है। एजेंसी का कहना है कि 8 जनवरी को कोलकाता में एक राजनीतिक रणनीतिकार संस्था के कार्यालय और उसके प्रमुख के आवास पर तलाशी ली जा रही थी। इसी दौरान हालात अचानक बदल गए।

ED का आरोप है कि तलाशी के समय राज्य की मुख्यमंत्री भारी पुलिस बल के साथ (ED Supreme Court Petition) मौके पर पहुंचीं, जिसके बाद जांच प्रक्रिया बाधित हुई और जब्त किए गए इलेक्ट्रॉनिक उपकरण व दस्तावेज मौके से हटवा लिए गए।

ED की याचिका में क्या कहा गया?

एजेंसी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया है कि जांच के दौरान राज्य मशीनरी की सक्रिय भूमिका ने तलाशी को टकराव में बदल दिया। ED का दावा है कि यह सीधा-सीधा वैधानिक जांच को प्रभावित करने का प्रयास है।

जांच एजेंसी का आरोप: राज्य तंत्र ने रोकी कार्रवाई

ED की ओर से दाखिल याचिका में कहा गया है कि जिस तरीके से तलाशी स्थलों पर नियंत्रण किया गया, वह जांच एजेंसी के अधिकारों को निष्प्रभावी करने जैसा है। एजेंसी ने इसे कानून के शासन पर सीधा प्रहार बताया है और मांग की है कि पूरे घटनाक्रम की स्वतंत्र जांच हो।

जांच एजेंसी ने यह भी रेखांकित किया है कि जिस राजनीतिक परामर्श संस्था पर छापा पड़ा, उसका पहले सत्तारूढ़ दल के साथ कामकाज रहा है, जिससे मामले की संवेदनशीलता और बढ़ जाती है।

कलकत्ता हाईकोर्ट में भी चल रही कानूनी जंग

इस प्रकरण को लेकर राज्य के उच्च न्यायालय में भी पहले से कानूनी प्रक्रिया जारी है। जहां एक ओर जांच एजेंसी ने अपनी याचिका दाखिल की है, वहीं राज्य सरकार और सत्तारूढ़ दल की ओर से भी अलग-अलग याचिकाएं पेश की गई हैं।

हालांकि अव्यवस्था के चलते निर्धारित तारीख पर सुनवाई नहीं हो सकी, लेकिन अब इस मामले पर 14 जनवरी को हाईकोर्ट में बहस होने की संभावना है।

क्या दर्ज होगी FIR?

ED ने सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया है कि मामले में केंद्रीय एजेंसी द्वारा FIR दर्ज कर स्वतंत्र जांच की अनुमति (ED Supreme Court Petition) दी जाए। यदि अदालत से हरी झंडी मिलती है, तो यह मामला राज्य और केंद्र के रिश्तों में बड़ा मोड़ ला सकता है।

सियासत से आगे संवैधानिक सवाल

यह मामला अब सिर्फ एक छापेमारी या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया है। सवाल यह भी है कि क्या किसी वैधानिक जांच में इस तरह का हस्तक्षेप स्वीकार्य है और जांच एजेंसियों को अपने अधिकारों की रक्षा के लिए शीर्ष अदालत का सहारा क्यों लेना पड़ा।

आने वाले दिनों में सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में होने वाली सुनवाई न सिर्फ बंगाल की राजनीति, बल्कि संघीय ढांचे से जुड़े कई अहम सवालों के जवाब तय कर सकती है।

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