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Home » महिला आरक्षण का रास्ता साफ, 2027 जनगणना के बाद बढ़ेगी लोस-विस सीटों की संख्या

महिला आरक्षण का रास्ता साफ, 2027 जनगणना के बाद बढ़ेगी लोस-विस सीटों की संख्या

By Newsdesk Admin
12/06/2025
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Contents
  • जनगणना पूरी तरह होगी डिजिटल
  • दक्षिण राज्यों की चिंता का ध्यान

सीजी भास्कर, 12 जून। देश में 2027 में होने वाली जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभा सीटों के परिसीमन की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। यह परिसीमन न केवल संसद और राज्य विधानसभाओं की सीटों की संख्या में वृद्धि का मार्ग प्रशस्त करेगा, बल्कि महिला आरक्षण को भी लागू करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम होगा।

दरअसल, वर्ष 2023 में संसद से पारित नारी शक्ति वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं को लोकसभा और विधानसभाओं में 33% आरक्षण देने का प्रावधान किया गया था। हालांकि, यह आरक्षण जनगणना और परिसीमन के बाद ही लागू किया जा सकता है।

केंद्र सरकार की मंशा है कि यह प्रक्रिया वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले पूरी कर ली जाए ताकि उसी चुनाव से महिला आरक्षण लागू हो सके।

कोविड-19 महामारी के कारण 2021 की जनगणना में काफी विलंब हुआ है और जनगणना आंकड़े गिनती होने के करीब तीन साल बाद आएंगे। इसलिए 2011 की जनगणना के आधार पर भी परिसीमन लागू किया जा सकता है।

जनगणना पूरी तरह होगी डिजिटल

जानकारों के अनुसार, इस बार जनगणना पूरी तरह डिजिटल होगी और क्षेत्रवार आंकड़े पहले की तुलना में काफी तेजी से, संभवतः 1 से 1.5 साल के भीतर उपलब्ध हो जाएंगे। इससे परिसीमन आयोग को शीघ्रता से काम करने में सुविधा मिलेगी। भारत में अंतिम बार व्यापक परिसीमन 2008 में किया गया था, जो 2001 की जनगणना के आधार पर हुआ था। हालांकि, उस परिसीमन में लोकसभा या विधानसभा सीटों की संख्या नहीं बढ़ाई गई थी।

इसकी वजह यह थी कि 84वें संविधान संशोधन (2002) के तहत वर्ष 2026 तक सीटों की संख्या में कोई परिवर्तन नहीं करने का निर्णय लिया गया था, लेकिन इस संशोधन में यह भी स्पष्ट किया गया था कि 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आधार पर सीटों में वृद्धि और पुनर्विन्यास संभव होगा।

दक्षिण राज्यों की चिंता का ध्यान

एक बड़ा मुद्दा दक्षिण भारतीय राज्यों की चिंताओं को लेकर भी है। दक्षिण के राज्य जनसंख्या नियंत्रण में अपेक्षाकृत सफल रहे हैं, जिसे लेकर दक्षिण भारत के राज्यों ने आशंका जताई है कि उनके संसदीय प्रतिनिधित्व में कमी हो सकती है।

लेकिन सरकार का कहना है कि संविधान की मर्यादाओं के तहत इन राज्यों की हिस्सेदारी में कोई कमी नहीं आने दी जाएगी। जैसा कि पूर्वोत्तर राज्यों और अंडमान-निकोबार जैसे केंद्र शासित प्रदेशों में कम जनसंख्या के बावजूद प्रतिनिधित्व सुनिश्चित किया गया है, वैसा ही मॉडल दक्षिण के लिए भी अपनाया जा सकता है।

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