सीजी भास्कर, 17 अगस्त : कभी ग्रामीणों की आवाजाही और खेती-किसानी (Tadpala Village) से गुलजार रहने वाला ताड़पाला गांव अब वीरान पड़ा है। 1990 के दशक के मध्य में इलाके में नक्सली प्रभाव बढ़ने के बाद ग्रामीण धीरे-धीरे अपने घर छोड़कर चले गए। करीब तीन दशक बीतने के बाद भी अधिकांश परिवार वापस नहीं लौटे हैं। अब गांव में ग्रामीण परिवारों की जगह सुरक्षा बलों की मौजूदगी नजर आती है।
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नक्सली कॉरिडोर बनने के बाद खाली हुआ गांव
करेगुट्टा की तलहटी में बसा ताड़पाला (Tadpala Village) कभी स्थानीय ग्रामीणों की गतिविधियों का केंद्र था। जंगल से मिलने वाली चीजों से ग्रामीण सामान तैयार करते और आसपास के बाजारों में बेचते थे। स्थानीय लोगों के अनुसार, वर्ष 1995-96 तक यहां परिवार रहते थे।
बाद में गांव से होकर गुजरने वाला रास्ता नक्सलियों के लिए तीन राज्यों के बीच आवाजाही का प्रमुख कॉरिडोर बन गया। इलाके में नक्सली प्रभाव बढ़ने के साथ ग्रामीणों के लिए यहां रहना मुश्किल होता गया और धीरे-धीरे पूरा गांव खाली हो गया।
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तीन दशक बाद भी ग्रामीणों का पूरा रिकॉर्ड नहीं
ताड़पाला (Tadpala Village) के ग्रामीण करीब 30 साल पहले गांव छोड़कर कहां गए, इसकी स्पष्ट जानकारी फिलहाल प्रशासन के पास भी नहीं है। लंबे समय तक प्रशासनिक पहुंच सीमित रहने और संचार सुविधाओं के अभाव के कारण गांव में रहने वाले परिवारों का पूरा रिकॉर्ड तैयार नहीं हो सका।
बीजापुर कलेक्टर विश्वदीप कुमार के मुताबिक, ताड़पाला फिलहाल वीरान है और यह क्षेत्र दो राज्यों की सीमा से जुड़ा हुआ है। सुरक्षा कैंप वाला हिस्सा बीजापुर जिले में आता है, जबकि गांव का बड़ा हिस्सा तेलंगाना की ओर है।
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करेगुट्टा की पहाड़ियों में रहा नक्सलियों का प्रभाव
करेगुट्टा की पहाड़ियां लंबे समय तक नक्सलियों के लिए सुरक्षित ठिकाना बनी रहीं। जंगल और पहाड़ी क्षेत्र का फायदा उठाकर नक्सली यहां से बस्तर के अलग-अलग हिस्सों में गतिविधियां संचालित करते थे। सुरक्षा बलों के मुताबिक, क्षेत्र में हथियार और आईईडी तैयार करने का नेटवर्क भी सक्रिय था।
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2025 में सुरक्षा कैंप बना, बदली इलाके की तस्वीर
लंबे समय तक नक्सली प्रभाव में रहने के बाद वर्ष 2025 में सुरक्षा बलों ने ताड़पाला में बेस कैंप स्थापित किया। पहाड़ी के ऊपर भी सुरक्षा कैंप बनाया गया। इसके बाद इलाके में सुरक्षा बलों की मौजूदगी बढ़ी है।
अब गांव में ग्रामीण परिवारों के बजाय सुरक्षा बलों का डेरा नजर आता है। इलाके में सड़क निर्माण का काम भी जारी है। सड़क बनने से सुरक्षा बलों की पहुंच बढ़ रही है और इस दुर्गम क्षेत्र को मुख्य मार्गों से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। हालांकि, आईईडी के खतरे को देखते हुए जंगल के भीतर आवाजाही अभी भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं मानी जा रही है।
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सरकार ने कहा- अब लौट सकते हैं ग्रामीण
वन मंत्री केदार कश्यप ने कहा है कि क्षेत्र अब नक्सलियों के प्रभाव से मुक्त हो चुका है। उनके मुताबिक, जिन परिस्थितियों के कारण ग्रामीणों को गांव छोड़ना पड़ा था, वे अब खत्म हो गई हैं और ग्रामीण चाहें तो वापस लौट सकते हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल उन परिवारों को लेकर है, जिन्होंने 20 से 30 साल पहले ताड़पाला छोड़ा था। वे अब कहां रह रहे हैं, उनकी जमीन और संपत्ति की स्थिति क्या है और उनकी अगली पीढ़ी गांव में दोबारा बसना चाहती है या नहीं, इन सवालों के जवाब अभी स्पष्ट नहीं हैं।
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तीन दशक बाद गांव की वापसी सबसे बड़ी चुनौती
नक्सली प्रभाव कम होने के बाद सुरक्षा व्यवस्था मजबूत हुई है और सड़क निर्माण जैसे काम आगे बढ़ रहे हैं। इसके बावजूद ताड़पाला (Tadpala Village) को दोबारा आबाद करना आसान नहीं होगा। वर्षों पहले विस्थापित हुए परिवारों की पहचान, जमीन और संपत्ति का रिकॉर्ड तथा उनकी वापसी की इच्छा जैसे मुद्दे अब भी सामने हैं।
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