सीजी भास्कर, 15 जुलाई : गरियाबंद जिले में प्रभारी विकासखंड शिक्षा अधिकारी हेमंत कुमार साहू एवं सहायक ग्रेड-2 मोहेश्वर मार्कण्डेय (Gariaband Education Department) पर रिश्वत मांगने के आरोपों की जांच को लेकर नया विवाद खड़ा हो गया है। जांच समिति द्वारा शिकायतकर्ता का पक्ष सुनने और जांच प्रक्रिया पूरी करने के बावजूद अब तक प्रतिवेदन उच्च कार्यालय को नहीं भेजे जाने से जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) गरियाबंद की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। मामले में अनावश्यक देरी को लेकर शिकायतकर्ता सहित स्थानीय लोगों ने पारदर्शी कार्रवाई की मांग की है।
25 जून को दर्ज किए गए थे शिकायतकर्ता के बयान
जिला शिक्षा अधिकारी, गरियाबंद के पत्र क्रमांक 2928/जि.शि.अ./सतर्कता/जांच/2026-27 दिनांक 05 जून 2026 के आधार पर गठित जांच समिति ने शिकायतकर्ता श्रीमती संतोषी ध्रुव को 25 जून 2026 को शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय पाण्डुका में उपस्थित होकर अपना पक्ष रखने के लिए बुलाया था। इस दौरान समिति ने शिकायत से जुड़े सभी पक्षों के बयान दर्ज किए और आवश्यक दस्तावेज भी एकत्र किए।
जांच पूरी, लेकिन रिपोर्ट अब तक नहीं भेजी गई
जानकारी के अनुसार जांच समिति (Gariaband Education Department) ने अपनी जांच प्रक्रिया पूरी कर ली है। इसके बावजूद यदि जांच प्रतिवेदन निर्धारित समय में सक्षम अथवा उच्च कार्यालय को प्रेषित नहीं किया गया है, तो इससे जांच प्रक्रिया में हो रही देरी पर कई तरह के सवाल खड़े हो रहे हैं। लोगों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद रिपोर्ट को समयबद्ध तरीके से भेजा जाना चाहिए, ताकि मामले में नियमानुसार आगे की कार्रवाई हो सके।
(Gariaband Education Department) रिश्वत के आरोपों से जुड़ा है मामला
बताया जा रहा है कि पूरा मामला एक दिवंगत शिक्षक की पारिवारिक पेंशन से संबंधित प्रकरण का है, जिसमें प्रभारी बीईओ और सहायक ग्रेड-2 कर्मचारी पर रिश्वत मांगने के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। ऐसे मामलों में निष्पक्ष जांच और समय पर निर्णय न केवल शिकायतकर्ता के हित में आवश्यक है, बल्कि शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली पर आम लोगों का भरोसा बनाए रखने के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
समयबद्ध कार्रवाई की उठी मांग
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक संगठनों ने मांग की है कि यदि जांच पूरी हो चुकी है तो उसका प्रतिवेदन तत्काल उच्च कार्यालय को भेजा जाए और सक्षम स्तर पर नियमानुसार आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। उनका कहना है कि मामले में अनावश्यक विलंब से प्रशासनिक पारदर्शिता पर सवाल उठ रहे हैं और इससे शिकायतकर्ता को भी न्याय मिलने में देरी हो रही है।



