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Home » खैरागढ़-राजनांदगांव बना बर्ड पैराडाइज, 296 प्रजातियों का रिकॉर्ड

खैरागढ़-राजनांदगांव बना बर्ड पैराडाइज, 296 प्रजातियों का रिकॉर्ड

By Newsdesk Admin
23/04/2026
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सीजी भास्कर 23 अप्रैल

खैरागढ़। छत्तीसगढ़ के अंतिम छोर पर स्थित खैरागढ़ और राजनांदगांव जिले अब देश के उभरते हुए प्रमुख बर्ड हॉटस्पॉट के रूप में तेजी से उभर रहे हैं। हाल ही में सामने आए एक विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन ने इस क्षेत्र की जैव विविधता को न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अहम बना दिया है।

296 प्रजातियों का वैज्ञानिक रिकॉर्ड
वर्ष 2019 से 2025 के बीच किए गए इस अध्ययन में कुल 296 पक्षी प्रजातियों का वैज्ञानिक दस्तावेजीकरण किया गया है, जो 18 गण (ऑर्डर) और 77 कुल (फैमिली) से संबंधित हैं। यह आंकड़ा इस क्षेत्र की समृद्ध जैव विविधता और पक्षियों के लिए अनुकूल वातावरण को दर्शाता है। अध्ययन में पासेरीफॉर्मीस वर्ग का प्रभुत्व सामने आया, जो कुल प्रजातियों का 40 प्रतिशत से अधिक है। यह वर्ग पारिस्थितिक संतुलन का मजबूत संकेतक माना जाता है, क्योंकि इसमें छोटे और पर्यावरण के प्रति संवेदनशील पक्षी शामिल होते हैं।

प्रजनन गतिविधियों की बड़ी पुष्टि
इस शोध की सबसे अहम उपलब्धि 56 से 58 पक्षी प्रजातियों के प्रजनन की पुष्टि है। घोंसलों, अंडों, बच्चों के पालन-पोषण और कॉलोनी निर्माण जैसे प्रमाणों के आधार पर यह स्पष्ट हुआ है कि यह क्षेत्र केवल प्रवासी पक्षियों का अस्थायी पड़ाव नहीं, बल्कि स्थायी प्रजनन स्थल भी बन चुका है। अध्ययन में रिवर टर्न और एशियन ब्राउन फ्लाईकैचर का छत्तीसगढ़ में पहली बार प्रजनन दर्ज किया गया है। इसके अलावा, सिनेरियस वल्चर की राज्य में पहली बार उपस्थिति भी दर्ज की गई है, जो एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक उपलब्धि मानी जा रही है।

मोज़ेक इकोसिस्टम से मिली मजबूती
इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी को मजबूती इसकी विविध भौगोलिक संरचना से मिलती है। आर्द्रभूमि, घासभूमि, मैकाल पर्वतमाला के वन और मानव-परिवर्तित क्षेत्र मिलकर एक संतुलित “मोज़ेक इकोसिस्टम” बनाते हैं। मोज़ेक इकोसिस्टम वह स्थिति होती है, जहां एक ही इलाके में जंगल, जल स्रोत, घासभूमि और मानव बस्तियां जैसे विभिन्न प्रकार के पर्यावरण साथ मौजूद होते हैं, जिससे अनेक प्रकार के जीवों को अनुकूल आवास मिलता है।

जलाशय और वन क्षेत्र बने प्रमुख केंद्र
बाघनदी, छिंदारी और खातूटोला जैसे जलाशय पक्षियों के प्रमुख केंद्र के रूप में उभरे हैं, जहां स्थानीय और प्रवासी दोनों प्रजातियों की बड़ी संख्या देखी गई है। वहीं, डोंगरगढ़ ढारा वन क्षेत्र भी अत्यंत महत्वपूर्ण पाया गया, जहां कई वन-आश्रित प्रजातियों की प्रजनन गतिविधियां दर्ज की गईं। शोधकर्ताओं ने इस क्षेत्र को “कंजर्वेशन रिजर्व” घोषित करने की सिफारिश की है, ताकि इसके पारिस्थितिक संतुलन का लंबे समय तक संरक्षण किया जा सके।

रेड लिस्ट की प्रजातियों की मौजूदगी
अध्ययन में 16 से अधिक ऐसी प्रजातियां दर्ज की गई हैं, जो अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आईयूसीएन रेड लिस्ट में शामिल हैं। इनमें संकटग्रस्त इजिप्शियन वल्चर, असुरक्षित श्रेणी की लेसर एडजुटेंट स्टॉर्क और कॉमन पोचार्ड शामिल हैं। यह इस क्षेत्र के वैश्विक संरक्षण महत्व को और मजबूत करता है।

चुनौतियां भी आईं सामने
अध्ययन में कई गंभीर खतरों की भी पहचान की गई है। पेड़ों की कटाई, कीटनाशकों का अत्यधिक उपयोग, अवैध शिकार, सड़क दुर्घटनाएं और बिजली के ढांचे से होने वाली मौतें पक्षियों के लिए बड़े खतरे बन रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि समय रहते इन समस्याओं पर नियंत्रण नहीं किया गया तो जैव विविधता को नुकसान पहुंच सकता है।

संरक्षण के लिए सुझाए गए उपाय
शोधकर्ताओं ने आर्द्रभूमियों और वन क्षेत्रों के संरक्षण, सतत भूमि उपयोग, कीटनाशकों के नियंत्रित उपयोग और स्थानीय समुदाय की भागीदारी को जरूरी बताया है। साथ ही, छिंदारी क्षेत्र में चल रही इको-टूरिज्म गतिविधियां संरक्षण के सकारात्मक उदाहरण के रूप में सामने आई हैं।

स्थानीय प्रयास से बना बड़ा शोध
इस अध्ययन को प्रतीक ठाकुर (प्रकृति शोध एवं संरक्षण वेलफेयर सोसाइटी, डोंगरगढ़), अविनाश भोई (सीईओ, जिला पंचायत कोंडागांव), डॉ. दानेश सिन्हा (आयुष मेडिकल ऑफिसर) और डॉ. अनुराग विश्वकर्मा (प्रोजेक्ट ऑफिसर, डब्ल्यूडब्ल्यूएफ सेंट्रल इंडिया) ने संयुक्त रूप से तैयार किया है। खास बात यह है कि इसकी शुरुआत किसी सरकारी परियोजना के तहत नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर नियमित बर्ड वॉचिंग से हुई थी, जो आगे चलकर एक विस्तृत वैज्ञानिक अध्ययन में बदल गई।

उभरता इको-टूरिज्म और रिसर्च हब
यह अध्ययन राजनांदगांव और खैरागढ़ का पहला व्यापक पक्षी सर्वेक्षण है, जो दर्शाता है कि यह क्षेत्र स्थानीय और प्रवासी दोनों प्रकार के पक्षियों के लिए महत्वपूर्ण आवास बन चुका है। खैरागढ़–डोंगरगढ़ अब केवल एक भौगोलिक क्षेत्र नहीं, बल्कि जैव विविधता, वैज्ञानिक शोध और संभावित इको-टूरिज्म का उभरता केंद्र बन गया है। यदि संरक्षण और विकास के बीच संतुलन बनाए रखा गया, तो आने वाले समय में यह क्षेत्र देश के प्रमुख पर्यावरणीय मॉडल के रूप में स्थापित हो सकता है।

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