बिलासपुर में फर्जी सर्पदंश मुआवजा घोटाले की जांच में चौंकाने वाले खुलासे हुए हैं। पुलिस ने अब तक डॉक्टर, पुलिसकर्मी, तहसील कर्मचारियों और एक अधिवक्ता सहित 17 आरोपियों को गिरफ्तार किया है। जांच में सामने आया है कि अस्पताल में किसी व्यक्ति की मौत की सूचना मिलते ही कथित गिरोह सक्रिय हो जाता था और मौत को सर्पदंश बताकर फर्जी दस्तावेजों के जरिए मुआवजा हासिल करने की साजिश रची जाती थी।
पुलिस के अनुसार गिरोह का सरगना अधिवक्ता हीरा खांडेकर था, जिसे ‘एडवोकेट डायमंड गैंग’ के नाम से जाना जाता है। आरोप है कि गिरोह के सदस्य मृतक के परिजनों को सरकारी मुआवजे का लालच देकर यह बयान दिलवाते थे कि मौत सांप काटने से हुई है, जबकि कई मामलों में मौत की वास्तविक वजह कुछ और थी।
जांच में यह भी सामने आया है कि सिम्स अस्पताल से मौत की जानकारी कुछ पुलिसकर्मियों और होमगार्ड जवानों के माध्यम से गिरोह तक पहुंचती थी। इसके बाद गिरोह के सदस्य परिजनों से संपर्क कर उन्हें मुआवजा दिलाने का भरोसा देते थे और पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते थे।
पुलिस ने बताया कि तहसील स्तर पर फर्जी प्रकरण तैयार करने के लिए एक से डेढ़ लाख रुपये तक की रकम ली जाती थी। आरोप है कि फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट, पटवारी प्रतिवेदन और अन्य दस्तावेज तैयार कर मुआवजा प्रकरण स्वीकृत कराया जाता था।
जांच एजेंसियों के मुताबिक कुछ मामलों में शवों के साथ छेड़छाड़ कर सर्पदंश के निशान दिखाने की कोशिश भी की गई। इसके बाद संबंधित थानों में मर्ग पंचनामा तैयार कराया जाता था और पोस्टमार्टम रिपोर्ट में हेरफेर कर मौत का कारण सर्पदंश दर्शाया जाता था।
फर्जी पोस्टमार्टम रिपोर्ट और हस्ताक्षरों का मामला सामने आने के बाद कई डॉक्टर जांच के दायरे में आ गए हैं। एक महिला डॉक्टर को गिरफ्तार कर जेल भेजा जा चुका है, जबकि एक अन्य डॉक्टर के फरार होने की जानकारी मिली है। पुलिस उनके ठिकानों पर लगातार दबिश दे रही है।
पुलिस जांच में कोनी थाना क्षेत्र के सर्पदंश से जुड़े सभी मामलों में दस्तावेजों में गड़बड़ी पाई गई है। कई मामलों में मृतकों के परिजनों को यह तक जानकारी नहीं थी कि उनके नाम पर मुआवजा स्वीकृत हो चुका है।
मुआवजा स्वीकृत होने के बाद राशि मृतकों के परिजनों के खातों में भेजी जाती थी। आरोप है कि गिरोह के सदस्य परिजनों को थोड़ी रकम देकर बाकी पैसा खुद निकाल लेते थे।
पुलिस अब तक 14 से अधिक ठिकानों पर छापेमारी कर चुकी है। जांच में स्वास्थ्य विभाग, पुलिस विभाग और राजस्व विभाग से जुड़े कई अधिकारियों और कर्मचारियों की भूमिका की जांच की जा रही है।
मामले में गिरफ्तार तहसील कर्मचारियों के समर्थन में कर्मचारी संगठनों ने विरोध जताया है और निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका आरोप है कि केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई की जा रही है, जबकि बड़े अधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए।
पुलिस अधीक्षक ने कहा है कि यह संगठित तरीके से किया गया फर्जीवाड़ा प्रतीत होता है और जांच में जिस किसी की भी संलिप्तता सामने आएगी, उसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई की जाएगी। फिलहाल सर्पदंश मुआवजा से जुड़े सभी पुराने मामलों की दोबारा जांच की जा रही है और घोटाले का दायरा बढ़ने की आशंका जताई जा रही है।



