सीजी भास्कर, 30 अप्रैल : बस्तर के सुदूर वनांचलों से बदलाव की एक ऐसी सुखद बयार बह रही है, जो हिंसा के अंधकार को उम्मीद की रोशनी में बदल रही है। कभी नारायणपुर के अबूझमाड़ जैसे दुर्गम जंगलों में बंदूक लेकर भटकने वाले हाथ आज प्रगति के ‘ट्रैक्टर’ का स्टेयरिंग थाम रहे हैं। जिला प्रशासन के नारायणपुर पुनर्वास अभियान (Narayanpur Rehabilitation Mission) के तहत आत्मसमर्पित नक्सलियों को मुख्यधारा से जोड़कर उन्हें विकास का सारथी बनाया जा रहा है।
साइकिल नहीं छुई थी, अब सीखेंगे ट्रैक्टर की तकनीक
यह बदलाव केवल एक कौशल तक सीमित नहीं है, बल्कि यह संकल्प की कहानी है। कलेक्टर नम्रता जैन के निरीक्षण के दौरान जब 40 पुनर्वासितों से संवाद किया गया, तो उन्होंने ट्रैक्टर चलाने और उसकी मरम्मत सीखने की प्रबल इच्छा जताई। इनमें से कई ऐसे हैं जिन्होंने जीवन में कभी साइकिल तक नहीं चलाई थी। उनके इस उत्साह को देखते हुए प्रशासन ने तत्काल नारायणपुर पुनर्वास अभियान (Narayanpur Rehabilitation Mission) के तहत सोमवार से तकनीकी प्रशिक्षण शुरू कर दिया है। अब ये लोग ड्राइविंग के साथ-साथ मशीनों के रखरखाव का हुनर भी सीख रहे हैं।
लोकतंत्र की पहचान और संवैधानिक अधिकार
मुख्यधारा में वापसी केवल आजीविका तक सीमित नहीं है, बल्कि यह इन लोगों को देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था का हिस्सा बनाने की भी एक गंभीर कोशिश है। इसी नारायणपुर पुनर्वास अभियान (Narayanpur Rehabilitation Mission) के तहत 8 लोगों को मतदाता पहचान पत्र (वोटर आईडी) सौंपे गए हैं, जिससे वे अब लोकतंत्र में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकेंगे। इसके साथ ही 25 लोगों का ऑनलाइन पंजीयन और 40 लोगों के फॉर्म-6 भरवाने की प्रक्रिया भी पूरी की गई है।
आत्मनिर्भरता से सम्मानजनक जीवन की ओर
नारायणपुर का लाइवलीहुड कॉलेज अब परिवर्तन का केंद्र बन चुका है। प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद ये युवा खेती और परिवहन जैसे क्षेत्रों में जुड़कर आत्मनिर्भर बन सकेंगे। शासन की जनकल्याणकारी योजनाओं और नारायणपुर पुनर्वास अभियान (Narayanpur Rehabilitation Mission) के माध्यम से अब इन हाथों में डर की जगह आत्मविश्वास और सुनहरे भविष्य की उम्मीद है। बस्तर की यह बदलती तस्वीर इस बात का प्रमाण है कि विकास और संवाद की ताकत किसी भी समस्या का स्थायी समाधान निकाल सकती है।


