सीजी भास्कर, 18 अगस्त : पढ़ाई पूरी करने के बाद मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी करना आज के युवाओं की पहली पसंद होती है, लेकिन महासमुंद के मोहन चंद्राकर ने अलग रास्ता चुना। एमबीए करने के बाद कई वर्षों तक नौकरी करने वाले मोहन चंद्राकर ने खेती को अपना व्यवसाय बनाया और प्राकृतिक एवं जैविक खेती (Organic Farming) को नई पहचान देने में जुट गए। आज वे प्रगतिशील किसान के साथ-साथ दूसरे किसानों के लिए भी प्रेरणा बने हुए हैं।
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एमबीए के बाद नौकरी छोड़ी, खेती को बनाया व्यवसाय
महासमुंद जिले के ग्राम केशवा निवासी मोहन चंद्राकर ने एमबीए की पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 1997 से 2013 तक मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी की। वर्ष 2013 में उन्होंने नौकरी छोड़कर खेती की ओर रुख किया। उन्होंने कृषि को केवल परंपरागत काम न मानकर इसे व्यवसाय के रूप में विकसित करने का संकल्प लिया।
इसके बाद उन्होंने प्राकृतिक और जैविक पद्धति (Organic Farming) से खेती शुरू की। पारंपरिक, सुगंधित और औषधीय गुणों वाली फसलों पर विशेष ध्यान देकर उन्होंने खेती में अलग प्रयोग किए।
सुगंधित धान से काला गेहूं तक, कई फसलों का उत्पादन
मोहन चंद्राकर के खेत में जावफूल, विष्णुभोग, जोहा, चखव, संजवनी, पीहू पर्पल राइस और काला गेहूं जैसी फसलों का उत्पादन किया जा रहा है। इन फसलों की खासियत और बाजार की मांग को ध्यान में रखते हुए वे खेती के साथ प्रसंस्करण और ब्रांडिंग पर भी काम कर रहे हैं।
अपनी उपज का प्रसंस्करण वे खुद की राइस मिल में करते हैं। इसके बाद ‘तथास्तु – अच्छे लोग, अच्छा भोजन’ ब्रांड के माध्यम से उत्पादों को बाजार तक पहुंचाया जाता है। इससे किसान के स्तर पर ही वैल्यू एडिशन और बेहतर बाजार उपलब्ध कराने की कोशिश की जा रही है।
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300 किसानों को जोड़ा, खेती के साथ बाजार की भी दी जानकारी
मोहन चंद्राकर ने वर्ष 2017 में तथास्तु फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी लिमिटेड यानी ऊर्जा कृषि एफपीओ का गठन किया। इसके माध्यम से करीब 300 किसानों को जोड़ा गया है।
वे किसानों को आधुनिक कृषि तकनीक, फसल विविधीकरण, प्रसंस्करण, ब्रांडिंग और बाजार से जुड़ाव की जानकारी दे रहे हैं। इससे किसानों को केवल उत्पादन तक सीमित रहने के बजाय अपनी उपज का बेहतर मूल्य हासिल करने के अवसर मिल रहे हैं।
खरीफ 2026 में वे कृषि विज्ञान केंद्र महासमुंद और इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर के विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में पारंपरिक सुगंधित धान की किस्मों के पुनरुत्थान पर भी काम कर रहे हैं।
बंजर जमीन पर लगाए 400 टीक, 200 चंदन के पौधे
खेती के साथ मोहन चंद्राकर पर्यावरण संरक्षण पर भी लगातार काम कर रहे हैं। उन्होंने करीब 6 एकड़ बंजर जमीन पर 400 ऑस्ट्रेलियन टीक के पौधे लगाए थे। आज ये पौधे 20 से 30 फीट तक ऊंचे हो चुके हैं।
वर्ष 2024 से उन्होंने सफेद चंदन के 200 पौधों के साथ आम, महुआ, जामुन, चीकू, अमरूद और अन्य फलदार एवं उपयोगी पेड़ों का भी संरक्षण और रोपण शुरू किया है। वे वृक्षारोपण को आने वाली पीढ़ी के लिए फिक्स डिपॉजिट मानते हैं।
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राष्ट्रीय स्तर पर मिला खेती के नवाचार का सम्मान
मोहन चंद्राकर के कृषि नवाचार (Organic Farming) को राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान मिली है। वर्ष 2018 में उन्हें आईसीएआर नई दिल्ली में श्रेष्ठ नवाचार करने वाले किसानों के साथ संवाद का अवसर मिला।
अप्रैल 2026 में उन्हें ‘राइस आइकॉन ऑफ इंडिया सम्मान’ से सम्मानित किया गया। इसके बाद 4 जून 2026 को रायपुर में मुख्यमंत्री श्री विष्णु देव साय ने उन्हें ‘नवाचार एवं प्रगतिशील किसान सम्मान’ से सम्मानित किया।
मोहन चंद्राकर की कहानी बताती है कि आधुनिक शिक्षा और कॉर्पोरेट अनुभव का इस्तेमाल खेती में नए प्रयोगों के लिए किया जाए तो कृषि को बेहतर व्यवसाय और रोजगार का मजबूत माध्यम बनाया जा सकता है। प्राकृतिक खेती, स्थानीय फसलों, प्रसंस्करण और बाजार से जुड़ाव के जरिए वे खुद के साथ दूसरे किसानों को भी आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम कर रहे हैं।




