सीजी भास्कर, 24 जुलाई : छत्तीसगढ़ की समृद्ध लोक संस्कृति को राष्ट्रीय मंच पर नई पहचान मिली है। रामनामी समुदाय पर आधारित डॉक्यूमेंट्री फिल्म ‘राम-नामी’ (Ram-Nami Documentary) को 72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री फिल्म श्रेणी में नामांकित किया गया है। प्रसिद्ध निर्देशक भारतबाला गणपति के निर्देशन में बनी यह फिल्म छत्तीसगढ़ की आध्यात्मिक परंपरा और लोक विरासत को देश-दुनिया तक पहुंचा रही है।
रामनामी समाज की अनूठी परंपरा को मिला मंच
72वें राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में रामनामी डॉक्यूमेंट्री (Ram-Nami Documentary) की उपलब्धि से पूरे छत्तीसगढ़, विशेषकर रामनामी समुदाय में उत्साह का माहौल है। फिल्म के माध्यम से रामनामी समाज की अनूठी जीवनशैली, आध्यात्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया गया है।
फिल्म के निर्देशक भारतबाला गणपति और उनकी निर्माण टीम के प्रयासों से छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति, आध्यात्मिक चेतना और भगवान श्रीराम की भक्ति परंपरा को राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिल रही है।
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शरीर पर राम नाम का गोदना Ram-Nami Documentary
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर संभाग के साथ ही सारंगढ़-बिलाईगढ़, सक्ती और जांजगीर-चांपा जिलों में बड़ी संख्या में निवास करने वाला रामनामी समाज अपनी अनूठी आध्यात्मिक जीवन शैली के लिए जाना जाता है।
इस समाज की सबसे खास पहचान पूरे शरीर पर राम नाम का गोदना (टैटू), सादगीपूर्ण जीवन और भगवान श्रीराम के प्रति अटूट आस्था है। रामनामी समाज सदियों से भक्ति, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक संरक्षण की मिसाल पेश करता आ रहा है।
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लोक विरासत और आध्यात्मिक मूल्यों का चित्रण
डॉक्यूमेंट्री फिल्म Ram-Nami Documentary में रामनामी समाज के गहरे जीवन मूल्यों, परंपराओं और आध्यात्मिक सोच को बेहद प्रभावशाली तरीके से दिखाया गया है। फिल्म ने इस अनूठी संस्कृति को देश-दुनिया के दर्शकों तक पहुंचाने का काम किया है।
फिल्म के माध्यम से छत्तीसगढ़ की लोक परंपरा और सांस्कृतिक विविधता को नई पहचान मिली है। इससे प्रदेश की सांस्कृतिक धरोहर को संरक्षित करने के प्रयासों को भी मजबूती मिलेगी।
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छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक अस्मिता को मिला सम्मान
राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में रामनामी डॉक्यूमेंट्री की उपलब्धि को प्रदेश की सांस्कृतिक अस्मिता के लिए महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है। संस्कृति प्रेमियों और बुद्धिजीवियों ने इसे छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं के लिए ऐतिहासिक क्षण बताया है।
यह उपलब्धि साबित करती है कि प्रदेश की लोक संस्कृति और परंपराएं राष्ट्रीय ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी अपनी अलग पहचान बना रही हैं।
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