सीजी भास्कर, 04 जुलाई : वरिष्ठ नागरिक अधिकार (Senior Citizen Rights) को लेकर छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई बेटा या बहू अपने बुजुर्ग माता-पिता को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते हैं, तो उन्हें घर से बेदखल किया जा सकता है। हाई कोर्ट ने 93 वर्षीय महिला की शिकायत पर मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल द्वारा पारित बेदखली के आदेश को सही ठहराते हुए बेटे-बहू की याचिका खारिज कर दी।
93 वर्षीय महिला ने बेटे-बहू पर लगाए थे प्रताड़ना के आरोप
मामला बिलासपुर के मुंगेली रोड स्थित मिनोचा कॉलोनी का है। 93 वर्षीय संतोष खन्ना ने शिकायत में आरोप लगाया था कि उनके बड़े बेटे देवेंद्र खन्ना और बहू नीरजा खन्ना लगातार उन्हें मानसिक रूप से प्रताड़ित कर रहे हैं तथा उनके जीवन को भी खतरा है। शिकायत और उपलब्ध दस्तावेजों के आधार पर मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल ने 12 सितंबर 2024 को बेटे-बहू को मकान खाली करने का आदेश दिया था। इस आदेश के खिलाफ दायर अपील को भी अपीलीय ट्रिब्यूनल ने खारिज कर दिया।
बेटे-बहू ने हाई कोर्ट में दी थी चुनौती
वरिष्ठ नागरिक अधिकार (Senior Citizen Rights) मामले में बेटे-बहू ने हाई कोर्ट में याचिका दायर कर तर्क दिया कि संपत्ति विवाद सिविल कोर्ट के अधिकार क्षेत्र का विषय है और ट्रिब्यूनल को बेदखली का आदेश देने का अधिकार नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि बुजुर्ग महिला आर्थिक रूप से सक्षम हैं और उन्होंने भरण-पोषण की मांग भी नहीं की है।
हाई कोर्ट ने क्या कहा?
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम, 2007 का उद्देश्य केवल भरण-पोषण सुनिश्चित करना नहीं, बल्कि बुजुर्गों को सम्मान, सुरक्षा और शांतिपूर्ण जीवन उपलब्ध कराना भी है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि किसी वरिष्ठ नागरिक को अपने ही परिवार से प्रताड़ना का सामना करना पड़ रहा है, तो मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल उन्हें संरक्षण देने और आवश्यक आदेश पारित करने का अधिकार रखता है।
संपत्ति विवाद अलग, बुजुर्गों की सुरक्षा अलग
कोर्ट ने यह भी कहा कि संपत्ति से जुड़े विवाद सिविल कोर्ट में विचाराधीन रह सकते हैं, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि बुजुर्गों को कानून के तहत मिलने वाले संरक्षण से वंचित कर दिया जाए। वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता है और कानून उन्हें प्रताड़ना से बचाने के लिए पर्याप्त अधिकार देता है।



