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Service Bond : सेवा बांड को लेकर अदालत ने ऐसा क्या कहा, जिससे चिकित्सा स्नातकों के लिए खुल गए नए रास्ते

By Newsdesk Admin
20/06/2026
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सीजी भास्कर, जून। बिलासपुर में चिकित्सा शिक्षा से जुड़े छात्रों और उनके परिवारों के बीच शनिवार को एक फैसले की चर्चा पूरे दिन (Service Bond) होती रही। लंबे समय से नियुक्ति और सेवा बांड को लेकर चल रही असमंजस की स्थिति के बीच आए इस निर्णय ने कई युवा डॉक्टरों को राहत की उम्मीद दी है। मेडिकल कॉलेजों से पढ़ाई पूरी कर चुके विद्यार्थियों में इस फैसले को लेकर खास उत्सुकता देखी गई।

Contents
  • सेवा बांड विवाद पर अदालत का फैसला : Service Bond
  • नियुक्ति में देरी को बनाया गया मुद्दा
  • राज्य सरकार ने रखा अपना पक्ष
  • नियम 10(6) को अदालत ने बताया स्पष्ट
  • एनओसी और बांड राशि पर भी मिली राहत

कई अभ्यर्थियों का कहना है कि पढ़ाई और इंटर्नशिप पूरी होने के बाद भी नियुक्ति प्रक्रिया में देरी उनके भविष्य की योजनाओं पर असर डाल रही थी। ऐसे माहौल में उच्च न्यायालय के फैसले ने न केवल संबंधित याचिकाकर्ताओं को राहत दी है, बल्कि समान परिस्थितियों में मौजूद अन्य छात्रों के लिए भी एक महत्वपूर्ण संदेश दिया है।

सेवा बांड विवाद पर अदालत का फैसला : Service Bond

छत्तीसगढ़ के चिकित्सा स्नातकों को उच्च न्यायालय से बड़ी राहत मिली है। न्यायमूर्ति अमितेंद्र किशोर प्रसाद की अदालत ने कहा है कि यदि राज्य सरकार छत्तीसगढ़ मेडिकल, डेंटल एवं फिजियोथेरेपी अंडर ग्रेजुएट प्रवेश नियम 2025 में तय समय सीमा के भीतर नियुक्ति आदेश जारी नहीं करती है, तो एमबीबीएस छात्रों द्वारा किया गया अनिवार्य सेवा बांड स्वतः समाप्त माना जाएगा।

यह फैसला सीआईएमएस बिलासपुर से वर्ष 2025 में एमबीबीएस पाठ्यक्रम और अनिवार्य रोटेटिंग इंटर्नशिप पूरी करने वाले नितीन कुमार सिंह, साहिल करी, चंद्र प्रकाश रवि और साक्षी कंवर की ओर से दायर रिट याचिका को स्वीकार करते हुए सुनाया गया।

नियुक्ति में देरी को बनाया गया मुद्दा

याचिकाकर्ताओं ने अदालत में कहा था कि राज्य सरकार ने छह माह की वैधानिक अवधि के भीतर नियुक्ति आदेश जारी नहीं किया। इसके बावजूद उन्हें अनापत्ति प्रमाण पत्र देने से इंकार किया गया। उनका कहना था कि नियम 10(6) के तहत निर्धारित अवधि में नियुक्ति आदेश जारी नहीं होने पर सेवा बांड स्वतः समाप्त हो जाता है।

याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आशुतोष मिश्रा ने दलील दी कि बार बार निवेदन किए जाने के बावजूद राज्य सरकार ने अपनी वैधानिक जिम्मेदारी पूरी (Service Bond) नहीं की। उनका तर्क था कि छह माह की अवधि पूरी होते ही बांड से जुड़े सभी दायित्व कानूनन समाप्त हो चुके थे और बाद में की गई प्रक्रिया से उन्हें फिर से लागू नहीं किया जा सकता।

राज्य सरकार ने रखा अपना पक्ष

राज्य सरकार ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि अभ्यर्थी प्रवेश के समय किए गए सेवा बांड से बंधे हुए हैं और उन्हें सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में सेवा देना आवश्यक है। सरकार ने यह भी कहा कि याचिकाकर्ता काउंसलिंग प्रक्रिया में शामिल हुए थे और बाद में उनके लिए नियुक्ति आदेश भी जारी किए गए थे। सरकार की ओर से यह तर्क भी रखा गया कि सेवा बांड की शर्तें अब भी प्रभावी हैं और अभ्यर्थियों को उनका पालन करना चाहिए।

नियम 10(6) को अदालत ने बताया स्पष्ट

सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने कहा कि नियम 10(6) पूरी तरह स्पष्ट है। न्यायालय ने अपने अवलोकन में कहा कि एमबीबीएस पाठ्यक्रम और इंटर्नशिप पूर्ण होने के छह माह के भीतर नियुक्ति आदेश जारी किया जाना अनिवार्य है। यदि ऐसा नहीं होता तो सेवा बांड स्वतः निरस्त माना जाएगा।

अदालत ने माना कि निर्धारित वैधानिक अवधि समाप्त होने के साथ ही बांड से जुड़े दायित्व भी समाप्त हो गए थे। इसी आधार पर बाद में आयोजित काउंसलिंग और 24 दिसंबर 2025 को जारी नियुक्ति आदेशों को अप्रभावी और गैर बाध्यकारी घोषित किया गया।

एनओसी और बांड राशि पर भी मिली राहत

अदालत ने राज्य सरकार के उस तर्क को भी स्वीकार नहीं किया जिसमें कहा गया था कि काउंसलिंग में भाग लेने के कारण याचिकाकर्ताओं का दावा कमजोर हो जाता है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी वैधानिक प्रावधान के विरुद्ध प्रतिषेध लागू नहीं होता।

साथ ही यह भी कहा गया कि याचिकाकर्ताओं को राज्य द्वारा प्रस्तावित पदस्थापना स्वीकार करने के लिए बाध्य (Service Bond) नहीं किया जा सकता। सामान्य वर्ग के उम्मीदवारों से 25 लाख रुपये और आरक्षित वर्ग के उम्मीदवारों से 20 लाख रुपये की बांड राशि वसूलने का कोई आधार नहीं बनता क्योंकि यह नियमों के विपरीत होगा।

रिट याचिका स्वीकार करते हुए अदालत ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि बिना किसी दंड या बांड राशि की मांग के याचिकाकर्ताओं को तत्काल एनओसी जारी किया जाए। साथ ही स्वास्थ्य विज्ञान एवं आयुष विश्वविद्यालय को निर्देश दिया गया कि यदि संबंधित छात्रों को अब तक एमबीबीएस की डिग्री नहीं मिली है तो नियमानुसार डिग्री प्रदान की जाए।

इस फैसले को छत्तीसगढ़ के उन अन्य एमबीबीएस स्नातकों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जिनके मामलों में नियुक्ति प्रक्रिया में देरी हुई है। भविष्य में सेवा बांड और नियुक्ति संबंधी विवादों में यह निर्णय एक अहम नजीर के रूप में देखा जा सकता है।

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