सीजी भास्कर, रायपुर, 22 अक्टूबर। छत्तीसगढ़ की प्राचीन सांस्कृतिक नगरी सिरपुर ने अंतरराष्ट्रीय पहचान की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बढ़ाया है। महासमुंद जिले में महानदी के तट पर स्थित सिरपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर की अस्थायी सूची (Sirpur UNESCO Tentative List) में शामिल किया गया है। प्राचीन मंदिरों, बौद्ध विहारों, दुर्लभ मूर्तियों और अद्भुत स्थापत्य कला के लिए प्रसिद्ध सिरपुर अब विश्व धरोहर का दर्जा हासिल करने की प्रक्रिया में आगे बढ़ेगा। लगभग डेढ़ हजार साल के इतिहास को समेटे यह नगरी छत्तीसगढ़ की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण केंद्र है।
- सिरपुर को मिली वैश्विक पहचान
- सिरपुर के निरीक्षण के बाद पहल
- दक्षिण कोसल की प्राचीन राजधानी
- धार्मिक सहिष्णुता की अनूठी मिसाल
- लक्ष्मण मंदिर की खास स्थापत्य कला
- गंधेश्वर मंदिर में आस्था और इतिहास
- बौद्ध विहारों का प्रमुख केंद्र
- तीवरदेव महाविहार की भव्यता
- सुरंग टीला और राम मंदिर
- उत्खनन में मिले हजारों पुरावशेष
- धातु मूर्तिकला का प्रसिद्ध केंद्र
- संग्रहालय में संरक्षित विरासत
- राजमहल के अवशेषों से इतिहास
- पर्यटन और रोजगार की उम्मीदें
- विश्व धरोहर की दिशा में अगला कदम

सिरपुर को मिली वैश्विक पहचान
सिरपुर का यूनेस्को की अस्थायी सूची (Sirpur UNESCO Tentative List) में शामिल होना प्रदेश की ऐतिहासिक और पुरातात्विक विरासत के लिए अहम उपलब्धि है। मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के नेतृत्व में राज्य सरकार ऐतिहासिक स्थलों के संरक्षण और उन्हें राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय पर्यटन मानचित्र पर पहचान दिलाने के प्रयास कर रही है।
पर्यटन एवं संस्कृति मंत्री राजेश अग्रवाल के मार्गदर्शन में भी प्रदेश की सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण, संवर्धन और पर्यटन विकास पर जोर दिया जा रहा है। सिरपुर को अस्थायी सूची में जगह मिलने से इसकी ऐतिहासिक महत्ता को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने और पर्यटन की संभावनाएं बढ़ने की उम्मीद है।
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सिरपुर के निरीक्षण के बाद पहल
केंद्रीय संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने 1 जनवरी 2026 को सिरपुर के ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थलों का निरीक्षण किया था। इस दौरान उन्होंने यहां की प्राचीन विरासत, स्मारकों और स्थापत्य कला की सराहना की थी। उन्होंने स्मारकों के संरक्षण और संवर्धन के लिए जरूरी कार्य करने तथा सिरपुर को यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के प्रयासों को प्राथमिकता देने की बात कही थी।
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दक्षिण कोसल की प्राचीन राजधानी
प्राचीन काल में श्रीपुर के नाम से प्रसिद्ध सिरपुर पांडुवंशी शासकों के शासनकाल में दक्षिण कोसल की राजधानी रहा। महानदी के तट पर बसा यह नगर राजनीतिक, धार्मिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक गतिविधियों का प्रमुख केंद्र था। शरभपुरीय शासकों प्रवरराज और महासुदेवराज के ताम्रपत्र यहां की प्राचीनता के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं। पांडुवंशी शासक महाशिवगुप्त बालार्जुन के लंबे शासनकाल में सिरपुर ने सांस्कृतिक और स्थापत्य विकास की नई ऊंचाइयां हासिल कीं। इस दौरान अनेक मंदिर, बौद्ध विहार, सरोवर और उद्यान बनाए गए। सातवीं शताब्दी में चीनी यात्री ह्वेनसांग ने भी इस क्षेत्र की यात्रा की थी। उसके यात्रा विवरण में यहां बौद्ध धर्म की समृद्ध परंपरा का उल्लेख मिलता है।

धार्मिक सहिष्णुता की अनूठी मिसाल
सिरपुर की खासियत यहां शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं का सहअस्तित्व है। शैव मत के अनुयायी महाशिवगुप्त बालार्जुन ने बौद्ध विहारों को भी दान देकर संरक्षण प्रदान किया था। यह परंपरा सिरपुर को प्राचीन भारत में धार्मिक सहिष्णुता और सांस्कृतिक समन्वय के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में पहचान देती है। इसी ऐतिहासिक विविधता और स्थापत्य विरासत के कारण सिरपुर को विश्व धरोहर की अस्थायी सूची (Sirpur UNESCO Tentative List) में शामिल किया जाना महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
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लक्ष्मण मंदिर की खास स्थापत्य कला
सिरपुर का प्रसिद्ध लक्ष्मण मंदिर प्राचीन भारतीय ईंट स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण है। लगभग सातवीं शताब्दी में निर्मित यह मंदिर ईंटों से बने प्राचीन मंदिरों में विशेष स्थान रखता है। इसकी निर्माण शैली, कलात्मक सजावट और बारीक शिल्पकारी तत्कालीन कारीगरों की दक्षता दर्शाती है।
करीब सात फुट ऊंची पत्थर की जगती पर स्थित यह मंदिर पंचरथ शैली का है। इसमें गर्भगृह, अंतराल और मंडप हैं। मंदिर की बाहरी दीवारों पर विभिन्न अलंकरणात्मक आकृतियां उकेरी गई हैं। प्रवेश द्वार पर शेषशायी भगवान विष्णु की प्रतिमा तथा विष्णु के विभिन्न अवतारों और कृष्ण लीला से जुड़े दृश्य विशेष आकर्षण हैं। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, इस मंदिर का निर्माण रानी वासटा ने अपने दिवंगत पति हर्षगुप्त की स्मृति में कराया था। इसका निर्माणकाल लगभग 650 ईस्वी माना जाता है।
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गंधेश्वर मंदिर में आस्था और इतिहास
महानदी के तट पर स्थित गंधेश्वर महादेव मंदिर सिरपुर की धार्मिक परंपरा का महत्वपूर्ण केंद्र है। प्राचीन काल में इसे गंधर्वेश्वर के नाम से जाना जाता था। आज भी यह श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख स्थल है। मंदिर के निर्माण में पुराने मंदिरों और बौद्ध विहारों से प्राप्त स्थापत्य खंडों का इस्तेमाल किया गया है। परिसर में संरक्षित प्रतिमाएं और पुरातात्विक अवशेष तत्कालीन कला, धार्मिक जीवन और पौराणिक परंपराओं की जानकारी देते हैं।
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बौद्ध विहारों का प्रमुख केंद्र
सिरपुर प्राचीन भारत में महायान बौद्ध धर्म का महत्वपूर्ण केंद्र रहा। यहां हुए पुरातात्विक उत्खननों में कई बौद्ध विहारों के अवशेष मिले हैं। इनमें आनंदप्रभु कुटी विहार और स्वास्तिक विहार प्रमुख हैं।
आनंदप्रभु कुटी विहार में भिक्षुओं के रहने के लिए 14 कक्ष थे और यह दो मंजिला संरचना थी। इसके मुख्य कक्ष में भगवान बुद्ध की भूमिस्पर्श मुद्रा में लगभग साढ़े छह फुट ऊंची प्रतिमा स्थापित है। यहां अवलोकितेश्वर सहित अन्य बौद्ध प्रतिमाएं भी प्राप्त हुई हैं। स्वास्तिक विहार अपनी विशिष्ट तल योजना के लिए प्रसिद्ध है। इन विहारों के अवशेष सिरपुर की धार्मिक, शैक्षणिक और आध्यात्मिक समृद्धि के प्रमाण हैं।
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तीवरदेव महाविहार की भव्यता
सिरपुर में वर्ष 2002-03 के दौरान डॉ. अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए उत्खनन में विशाल तीवरदेव महाविहार के अवशेष मिले थे। करीब 902 वर्गमीटर क्षेत्र में फैला यह महाविहार दक्षिण कोसल की बौद्ध स्थापत्य विरासत का महत्वपूर्ण उदाहरण है। कसडोल मार्ग पर स्थित यह स्थल अपने विशाल परिसर, अलंकृत प्रवेश द्वार और शिल्पकला के लिए जाना जाता है। प्रवेश द्वार पर पशु आकृतियों, पंचतंत्र की कथाओं और तत्कालीन सामाजिक जीवन से जुड़े दृश्य उकेरे गए हैं। परिसर में भूमिगत पत्थर की नालियों और व्यवस्थित कक्षों के अवशेष भी मिले हैं, जो प्राचीन निर्माण तकनीक की जानकारी देते हैं।
सुरंग टीला और राम मंदिर
सिरपुर का सुरंग टीला अपनी विशिष्ट संरचना, सीढ़ियों और मंदिर अवशेषों के कारण महत्वपूर्ण पुरातात्विक स्थल है। यहां की स्थापत्य विशेषताएं तत्कालीन धार्मिक और निर्माण परंपराओं की जानकारी देती हैं। इसके अलावा लक्ष्मण मंदिर के पूर्व में स्थित प्राचीन राम मंदिर भी ईंटों से निर्मित ऐतिहासिक संरचना है। इसका शिखर नष्ट हो चुका है, लेकिन दीवारों के अवशेष और ताराकृति योजना आज भी इसके स्थापत्य महत्व को दर्शाते हैं।
उत्खनन में मिले हजारों पुरावशेष
सिरपुर में हुए पुरातात्विक उत्खननों में दो हजार से अधिक पुरावशेष प्राप्त हुए हैं। इनमें धातु की प्रतिमाएं, प्रतिमा फलक, आभूषण बनाने के उपकरण, लोहे के बर्तन, ताले, जंजीर, दीपक, पूजा पात्र, मिट्टी के घड़े, कांच की चूड़ियां, मुहरें, खिलौने और प्राचीन सिक्के शामिल हैं। यहां प्राप्त एक चीनी सिक्के को चीनी सम्राट काई युवान के काल से संबंधित माना गया है। इसके अलावा शरभपुरीय शासक प्रसन्नमात्र और कलचुरी शासक रत्नदेव के समय के सिक्के भी मिले हैं। ये पुरावशेष सिरपुर के पुराने व्यापारिक, आर्थिक और सांस्कृतिक संपर्कों की जानकारी देते हैं।
धातु मूर्तिकला का प्रसिद्ध केंद्र
सातवीं और आठवीं शताब्दी में सिरपुर धातु प्रतिमाओं के निर्माण के लिए भी प्रसिद्ध था। वर्ष 1939 में यहां से धातु प्रतिमाओं का महत्वपूर्ण भंडार मिला था। इनमें भगवान बुद्ध, अवलोकितेश्वर, पद्मपाणि, वज्रपाणि, मंजुश्री, तारा, ऋषभनाथ और भगवान विष्णु की प्रतिमाएं शामिल हैं। इन प्रतिमाओं की मुखाकृति, हस्त मुद्राएं, वस्त्रों की बारीक बनावट और सूक्ष्म अलंकरण उस समय की उत्कृष्ट शिल्प परंपरा को दर्शाते हैं। सिरपुर से प्राप्त कई प्रतिमाएं रायपुर, नागपुर, नई दिल्ली और मुंबई के संग्रहालयों में संरक्षित हैं। कुछ कलाकृतियों का प्रदर्शन विदेशों में भी किया जा चुका है।
संग्रहालय में संरक्षित विरासत
लक्ष्मण मंदिर परिसर में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा स्थापित संग्रहालय में सिरपुर से प्राप्त कई महत्वपूर्ण प्रतिमाएं और स्थापत्य खंड संरक्षित हैं। इनमें शैव, वैष्णव, बौद्ध और जैन परंपराओं से जुड़ी कलाकृतियां शामिल हैं। संग्रहालय में चतुर्मुख शिवलिंग, महिषासुरमर्दिनी, नृसिंह, अंबिका, चामुंडा, विष्णु, सूर्य, मातृका, जैन तीर्थंकर और भगवान बुद्ध की प्रतिमाएं उल्लेखनीय हैं। ये कलाकृतियां सिरपुर की कला, आध्यात्मिकता और शिल्प कौशल की समृद्ध परंपरा को सामने लाती हैं।
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राजमहल के अवशेषों से इतिहास
महानदी के तट के समीप वर्ष 2000-01 में डॉ. अरुण कुमार शर्मा के निर्देशन में किए गए उत्खनन में एक विशाल परिसर के अवशेष मिले थे, जिन्हें राजमहल के अवशेषों के रूप में पहचाना गया। यहां भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की महत्वपूर्ण प्रतिमाएं भी प्राप्त हुईं। वर्ष 2001 से 2004 के बीच हुए विभिन्न उत्खननों में कई मंदिरों, बौद्ध विहारों और अन्य संरचनाओं के अवशेष सामने आए। इन खोजों से सिरपुर की राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक समृद्धि के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली।
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पर्यटन और रोजगार की उम्मीदें
सिरपुर को यूनेस्को की अस्थायी सूची (Sirpur UNESCO Tentative List) में जगह मिलने से सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, धार्मिक और पुरातात्विक पर्यटन को बढ़ावा मिलने की उम्मीद है। इससे देश-विदेश के पर्यटकों, इतिहासकारों, पुरातत्वविदों, शोधकर्ताओं और बौद्ध धर्म के अनुयायियों का आकर्षण बढ़ सकता है। पर्यटकों की आवाजाही बढ़ने पर होटल, होमस्टे, परिवहन, हस्तशिल्प, स्थानीय व्यंजन और अन्य पर्यटन सेवाओं से जुड़ी गतिविधियों के विस्तार की संभावनाएं बन सकती हैं। सिरपुर की बौद्ध विरासत में अंतरराष्ट्रीय बौद्ध पर्यटन परिपथ से जुड़ने की क्षमता भी है।
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विश्व धरोहर की दिशा में अगला कदम
यूनेस्को की अस्थायी सूची में शामिल होना विश्व धरोहर का दर्जा पाने की प्रक्रिया का शुरुआती महत्वपूर्ण चरण है। इसके बाद संबंधित स्थल के लिए विस्तृत नामांकन दस्तावेज, संरक्षण और प्रबंधन व्यवस्था तथा मूल्यांकन की प्रक्रिया पूरी करनी होती है। इसलिए अस्थायी सूची में शामिल होने का अर्थ यह नहीं है कि सिरपुर को विश्व धरोहर का अंतिम दर्जा मिल चुका है। सिरपुर की प्राचीन मंदिर वास्तुकला, बौद्ध विहार, दुर्लभ मूर्तियां और विभिन्न धार्मिक परंपराओं के सहअस्तित्व की विरासत इसे विशिष्ट बनाती है। महानदी के तट पर बसी यह ऐतिहासिक नगरी अब अपनी सांस्कृतिक पहचान को वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ाने की दिशा में एक नए पड़ाव पर पहुंची है।
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