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Home » छत्तीसगढ़ में 108 दिन में 30 पत्नियों की हत्या, शक शराब और यौन शोषण की मांग बनीं मौत की वजह

छत्तीसगढ़ में 108 दिन में 30 पत्नियों की हत्या, शक शराब और यौन शोषण की मांग बनीं मौत की वजह

By Newsdesk Admin
18/06/2025
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सीजी भास्कर, 18 जून। 1 मार्च से 16 जून 2025 के बीच यानि 108 दिनों में छत्तीसगढ़ में 30 पत्नियों की हत्या हुई। यानि हर 3-4 दिन में एक पत्नी मारी गई। ये सभी हत्याएं घर के भीतर हुईं और कातिल उनके पति ही थे। ​​​​​​इन हत्याओं के पीछे वजह बनी शराब का नशा, कहीं चरित्र शंका, तो कहीं झगड़े और मानसिक तनाव। ​​​​​​

Contents
  • प्लान करके भी किया मर्डर
  • साली को चॉकलेट लाने भेजा, पत्नी को मार डाला
  • हत्याओं के पीछे पुरुष प्रधान मानसिकता बड़ा कारण- ईला
  • समाज को लड़कों की परवरिश की जरूरत

हाल ही में सोनम रघुवंशी ने अपनी पति की हत्या करवाई, इसके बाद सोशल मीडिया पर पतियों की सुरक्षा को लेकर सवाल किए जा रहे हैं। इस पर महिलाओं का कहना है कि, उन पर भी लगातार अत्याचार हो रहे हैं।

पिछले 108 दिन में हुए मामलों पर नजर डालें तो धमतरी में 26 साल के इलेक्ट्रिशियन ने सब्जी काटने वाले हंसिए से अपनी 22 साल की पत्नी का गला काट दिया। तीन महीने पहले ही शादी हुई थी। हत्या से ठीक तीन दिन पहले इंस्टाग्राम पर पत्नी की तस्वीर पोस्ट कर लिखा था “Love you“।

रायपुर के बेलटुकरी गांव में 74 साल के बुजुर्ग ने अपनी 71 साल की पत्नी को गला दबाकर मार डाला। 20 साल बाद अयोध्या से लौटा था, पत्नी पर चरित्र शंका थी, खुद थाने जाकर बोला “मार डाला मैंने।” ये दो घटनाएं सिर्फ केस नहीं हैं, बात बस इतनी है- कि गुस्सा आया, शक हुआ और पत्नी को खत्म कर दिया।

सबसे ज्यादा वजहें:

  • चरित्र पर शंका (10+ मामले)
  • शराब/नशे के बाद विवाद (6-7 मामले)
  • शारीरिक संबंध बनाने से इनकार (2 मामले)
  • घरेलू झगड़े, गुस्से में हत्या
  • दहेज या पारिवारिक दबाव

पीड़ित महिलाओं की उम्र

26–35 साल: 14 महिलाएं मारी गईं – सबसे ज़्यादा केस इसी एज ग्रुप में

18–25 साल: 10 वाइफ्स की हत्या – शादी के कुछ सालों में ही जान ले ली।

36–50 साल: 5 महिलाएं – सालों पुरानी शादी भी जानलेवा बन गई।

50+ साल: 2 केस – बुजुर्ग महिलाएं भी नहीं बच पाईं, गुस्सा और शक कम नहीं हुआ

अगर एज ग्रुप की बात करें तो 26 से 35 साल की महिलाओं की सबसे ज्यादा हत्या हुई है। इस एज ग्रुप की 14 महिलाएं अपने ही पतियों के हाथों मारी गईं। यानी शादी के कुछ सालों बाद का समय सबसे ज़्यादा क्रिटिकल साबित हुआ।

वहीं 18 से 25 साल की 10 यंग महिलाएं, जिनमें से कई की नई-नई शादी हुई थी, वे भी इस हिंसा का शिकार बनीं। ये वो एज है जब शादी की शुरुआत होती है, लेकिन प्यार की जगह शक और गुस्से ने उनकी जान ले ली।

36–50 एज ग्रुप में 5 केस सामने आए हैं, जबकि 50+ एज ग्रुप की भी 2 महिलाएं मारी गईं। यानी शादी चाहे नई हो या 30 साल पुरानी घरेलू हिंसा की शक्ल में पति का गुस्सा कभी भी जानलेवा बन सकता है।

प्लान करके भी किया मर्डर

छत्तीसगढ़ में पतियों द्वारा की गई पत्नियों की हत्या के मामलों में कुछ घटनाएं ऐसी भी हैं, जो केवल गुस्से या विवाद का परिणाम नहीं थीं, बल्कि ठंडे दिमाग से रची गई पूरी साजिश का हिस्सा थीं।

बालोद जिले के डौंडी विकासखंड में पति ने अपनी टीचर पत्नी को बोलेरो से कुचला, फिर रॉड से पीट-पीटकर मार डाला। मर्डर के बाद पत्नी की मौत को हादसा दिखाने की भी कोशिश की थी, लेकिन CCTV फुटेज के आधार पर पकड़ा गया। मामला दल्लीराजहरा थाना क्षेत्र का है।

मृतिका का नाम बरखा वासनिक (35) है। वह डौंडी विकासखंड में शेरपार हायर सेकेंडरी स्कूल में शिक्षिका के पद पर पदस्थ थीं। आरोपी पति का नाम शिशुपाल वासनिक है। वह बिजली विभाग में इंजीनियर के पद पर पदस्थ था।

साली को चॉकलेट लाने भेजा, पत्नी को मार डाला

इसी तरह छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में पति ने गला घोंटकर पत्नी को मार डाला। पति ने ससुराल में जाकर पत्नी को मारा है। साली को चॉकलेट के लिए भेज दिया था। मौका मिलते ही गला घोंट दिया। मामला तोरवा थाना क्षेत्र का है।

आरोपी का नाम अंकित लास्कर (27) है। मृतिका का नाम मुस्कान सूर्यवंशी (24) है। मर्डर के बाद आरोपी ने थाने में जाकर सरेंडर कर दिया। पुलिस से कहा कि मैंने पत्नी को मार दिया है। उसकी लाश ससुराल में पड़ी है।

हत्याओं के पीछे पुरुष प्रधान मानसिकता बड़ा कारण- ईला

डॉ. ईला गुप्ता, कहती हैं, “हमारा समाज अब भी पुरुष को प्रधान और महिला को अधीन मानने वाली सोच से आगे नहीं बढ़ा है। रिलेशनशिप में पुरुष अक्सर खुद को ‘सुपीरियर’ मानता है और यह मानकर चलता है कि स्त्री उसकी हर बात मानेगी। जब ऐसा नहीं होता, तो वही प्रेम, हिंसा या हत्या में बदल जाता है।”

उनके मुताबिक, कई पुरुष यह भूल जाते हैं कि महिला की भी अपनी पसंद-नापसंद, इच्छाएं और असहमति का अधिकार है। जब यह असहमति सामने आती है, तब कई बार पुरुष मानसिक या शारीरिक हिंसा पर उतर आते हैं। यह भी एक सच्चाई है कि शारीरिक ताकत के मामले में पुरुष, महिला से अधिक बलवान होता है, और कई बार इसी ताकत का इस्तेमाल महिला को झुकाने या ‘सबक सिखाने’ के लिए किया जाता है।

समाज को लड़कों की परवरिश की जरूरत

डॉ. गुप्ता बताती हैं, “कल ही मेरे क्लिनिक में एक मामला आया। एक युवती भागती हुई मेरे पास पहुंची, रोते हुए मदद मांग रही थी। उसके पीछे उसका बॉयफ्रेंड भी पहुंचा और क्लिनिक के गेट पर हंगामा करने लगा। वो इस बात से नाराज था कि लड़की ने उसकी इजाजत के बिना मेरे सेशन में आने की हिम्मत कैसे की। कैमरे में रिकॉर्ड है कि उसने गेट के बाहर ही लड़की को थप्पड़ मारा।”

यह घटना महज एक उदाहरण है कि किस तरह कंट्रोल करने वाली सोच आज भी रिश्तों में हावी है। जब बात नहीं मानी जाती, तो कुछ पुरुष मानसिक प्रताड़ना से लेकर हत्या तक की हदें पार कर जाते हैं। डॉ. गुप्ता कहती हैं कि समाज को अब लड़कियों की नहीं, लड़कों की परवरिश की समीक्षा करने की जरूरत है।
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