सीजी भास्कर, 05 मई : तमिलनाडु की सत्ता के शिखर पर पहुंचने का विजय (Thalapathy Vijay Politics) का सपना अधूरा रह गया है। हालांकि वे राज्य के सबसे बड़े राजनीतिक दल बनकर उभरे हैं, लेकिन 118 के जादुई आंकड़े से 10 कदम दूर खड़ी टीवीके (TVK) के लिए असली फिल्म अब शुरू हुई है।
इस चुनाव परिणाम के बाद राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या विजय, अरविंद केजरीवाल की 2013 वाली गलती दोहराएंगे या फिर दक्षिण की राजनीति में कोई नया अध्याय लिखेंगे? केजरीवाल ने भी पहली बार कांग्रेस के बाहरी समर्थन से सरकार बनाई थी, लेकिन वह प्रयोग 49 दिनों में ही ढह गया था।
गठबंधन की ‘बैसाखी’ और नैरेटिव का खतरा
विजय के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन 10 विधायकों की है, जो सरकार बनाने के लिए अनिवार्य हैं। यदि वे कांग्रेस (5 सीटें) या एआईएडीएमके (AIADMK) से समर्थन लेते हैं, तो उन्हें अपनी उस छवि से समझौता करना होगा जिसे उन्होंने ‘नई और साफ-सुथरी राजनीति’ के रूप में पेश किया था।
चुनाव परिणाम (Thalapathy Vijay Politics) के बाद अगर वे किसी भी पुरानी पार्टी से हाथ मिलाते हैं, तो विपक्ष उन पर ‘अवसरवादी’ होने का टैग लगा सकता है। केजरीवाल के मामले में भी कांग्रेस का साथ लेना उनके ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ आंदोलन के लिए एक बड़ा झटका माना गया था।
प्रशासन का शून्य अनुभव और ‘निर्देशन’ का अभाव
फिल्मी पर्दे पर विजय हमेशा से अपने पिता एस.ए. चंद्रशेखर के निर्देशन में सफल रहे हैं, लेकिन सरकार चलाना फिल्म की शूटिंग नहीं है। विजय के पास प्रशासनिक और विधायी कार्यों का कोई पूर्व अनुभव नहीं है। स्टालिन की तरह एक अनुभवी नेता को हराने के बाद, अब उन्हें 34-35 मंत्रियों की कैबिनेट संभालनी होगी। विभागों का बंटवारा, गठबंधन साथियों की नाराजगी और नौकरशाही पर नियंत्रण रखना उनके लिए पहाड़ जैसी चुनौती होगी। दिल्ली में केजरीवाल के पास केवल 6 मंत्री थे, जबकि तमिलनाडु जैसे बड़े राज्य में प्रशासन का ढांचा कहीं अधिक जटिल है।
कांग्रेस का ‘एक्सचेंज ऑफर’ और पिता का प्रस्ताव
विजय के पिता एस.ए. चंद्रशेखर ने पहले ही कांग्रेस को साथ आने का न्योता दे दिया है। उनका तर्क है कि कांग्रेस अपनी खोई हुई जमीन टीवीके के साथ मिलकर हासिल कर सकती है। लेकिन राजनीति में कुछ भी मुफ्त नहीं मिलता।
अगर कांग्रेस इस तमिलनाडु चुनाव परिणाम (Thalapathy Vijay Politics) के बाद विजय को समर्थन देती है, तो वह बदले में बड़े विभागों या केंद्र में सहयोग की मांग करेगी। वहीं, एआईएडीएमके भी डीएमके को सत्ता से दूर रखने के लिए टीवीके को समर्थन देने की फिराक में है। विजय के लिए असली परीक्षा यह है कि वे अपनी स्वतंत्र पहचान बनाए रखते हुए कैसे इस चक्रव्यूह से बाहर निकलते हैं।


