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Traditional Paddy Conservation : देशी धान की विरासत बचाने में जुटा किसान, आधे एकड़ खेत में संरक्षित की 76 पारंपरिक किस्में

By Newsdesk Admin
30/06/2026
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Traditional Paddy Conservation
Traditional Paddy Conservation

सीजी भास्कर, 30 जून। रायगढ़ जिले के लैलूंगा विकासखंड के खैरबहार गांव के किसान भवानी पंडा देशी धान की विलुप्त होती पारंपरिक किस्मों को संरक्षित करने का अनूठा अभियान चला रहे हैं। खेती को केवल उत्पादन का माध्यम नहीं, बल्कि कृषि विरासत बचाने का मिशन बनाकर उन्होंने (Traditional Paddy Conservation) की दिशा में उल्लेखनीय पहल की है। महज आधे एकड़ खेत में उन्होंने 76 पारंपरिक देशी धान की किस्मों का संरक्षण कर नई मिसाल पेश की है।

Contents
  • स्वास्थ्य से मिली प्रेरणा, शुरू किया बीज संरक्षण अभियान
  • दूसरे राज्यों के किसान भी ले रहे बीज और जानकारी
  • राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचीं देशी धान की किस्में
  • जैविक खेती को भी दे रहे बढ़ावा

स्वास्थ्य से मिली प्रेरणा, शुरू किया बीज संरक्षण अभियान

करीब तीन वर्ष पहले शुरू हुई इस पहल की प्रेरणा भवानी पंडा को परिवार में स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के बाद मिली। खेती, भोजन और स्वास्थ्य के बीच संबंध को समझने के दौरान उनका रुझान जैविक खेती और पारंपरिक धान की किस्मों की ओर बढ़ा। इसके बाद उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों से देशी धान के बीज एकत्रित कर उनका संरक्षण शुरू किया। वर्तमान में उनके संग्रह में मूलामंजी, जवाफूल सहित कई दुर्लभ और पारंपरिक धान की किस्में शामिल हैं।

दूसरे राज्यों के किसान भी ले रहे बीज और जानकारी

भवानी पंडा केवल बीज संरक्षण तक सीमित नहीं हैं, बल्कि अन्य किसानों को भी देशी धान की खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं। उनके पास रायगढ़, जांजगीर-चांपा, सरगुजा सहित छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों के अलावा उत्तर प्रदेश के बलिया और ओडिशा के कटक से भी किसान बीज लेने और खेती की जानकारी प्राप्त करने पहुंच रहे हैं। वे कई किसानों को नि:शुल्क बीज उपलब्ध करा चुके हैं, ताकि पारंपरिक धान की खेती का दायरा लगातार बढ़ सके।

राष्ट्रीय स्तर पर पहुंचीं देशी धान की किस्में

उनके प्रयासों को हाल ही में रायपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में सम्मानित किया गया। इसके बाद इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के सहयोग से उन्होंने 28 देशी धान की किस्मों के नमूने राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षण के लिए भेजे। इनमें से 21 किस्मों का चयन राष्ट्रीय स्तर की प्रक्रिया के लिए किया गया, जबकि 7 किस्में पहले से पंजीकृत होने के कारण चयन प्रक्रिया में शामिल नहीं हो सकीं।

जैविक खेती को भी दे रहे बढ़ावा

भवानी पंडा का मानना है कि पारंपरिक बीजों के बेहतर उत्पादन के लिए मिट्टी की उर्वरता बनाए रखना बेहद जरूरी है। इसी वजह से वे रासायनिक खाद और कीटनाशकों के बजाय प्राकृतिक एवं जैविक संसाधनों का उपयोग करते हैं। सीमित संसाधनों से शुरू हुआ उनका यह प्रयास आज देशी धान संरक्षण, जैविक खेती और कृषि विरासत को बचाने की दिशा में एक प्रेरणादायक उदाहरण बन चुका है।

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