सीजी भास्कर, 13 अक्टूबर : छत्तीसगढ़ के उत्तरी जिलों में जनजातीय किसान अब पारंपरिक खेती के साथ बागवानी (Tribal Horticulture Chhattisgarh) को भी आमदनी का मजबूत जरिया बना रहे हैं। जशपुर, बलरामपुर और सूरजपुर में नाशपाती, काजू, आम, लीची, अमरूद, सेब और स्ट्रॉबेरी की खेती से किसानों को आय के नए अवसर मिल रहे हैं। नाबार्ड, रीड्स और उद्यानिकी विभाग के सहयोग से तैयार फल स्थानीय बाजारों के साथ दिल्ली, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, झारखंड और पश्चिम बंगाल तक पहुंच रहे हैं।
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जशपुर में बागवानी का विस्तार
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के गृह जिले जशपुर में बागवानी (Tribal Horticulture Chhattisgarh) का विस्तार खास तौर पर दिखाई दे रहा है। मनोरा और बगीचा ब्लॉक के किसान करीब 3,500 एकड़ में नाशपाती उगा रहे हैं। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, जिले में हर साल लगभग 1.75 लाख क्विंटल नाशपाती का उत्पादन होता है। इससे किसानों को प्रति एकड़ सालाना एक से डेढ़ लाख रुपये तक की आमदनी हो रही है।
मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने कहा कि बागवानी और अधिक मूल्य देने वाली नकदी फसलों की ओर किसानों का रुझान छत्तीसगढ़, विशेषकर जनजातीय समुदायों के लिए नई संभावनाएं खोल रहा है। राज्य सरकार बेहतर तकनीक, वैज्ञानिक खेती, सिंचाई और बाजार तक पहुंच उपलब्ध कराने के लिए प्रतिबद्ध है, ताकि किसान टिकाऊ खेती के साथ समृद्धि की ओर बढ़ सकें।
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नाशपाती से बढ़ी किसानों की कमाई
मनोरा ब्लॉक की अंजू लकड़ा इसकी मिसाल हैं। उन्होंने पिछले साल नाशपाती बेचकर 1.20 लाख रुपये कमाए थे। इस साल उन्हें 2.5 लाख रुपये की आमदनी होने की उम्मीद है। वहीं, केराकोना गांव के अनिल एक्का पांच एकड़ में नाशपाती की खेती कर रहे हैं। नाबार्ड की मदद से कुआं और मोटर पंप मिलने से उन्हें सिंचाई में सहूलियत मिली है। कृषि वैज्ञानिक भी समय-समय पर मिट्टी की जांच कर उत्पादन बढ़ाने के उपाय बताते हैं।
केराडीह के प्रसन्ना एक्का नाशपाती और लीची के साथ उद्यानिकी विभाग की सलाह पर हाइब्रिड मिर्च भी उगा रहे हैं। पतराटोली के अनरथ साय ने आम और लीची के बागों के बीच स्ट्रॉबेरी, टमाटर और फूलगोभी की खेती शुरू की है। वे एक एकड़ के शेडनेट हाउस में कलमी टमाटर भी उगाते हैं, जिसके निर्माण में सरकार ने 50 प्रतिशत सहायता दी है।
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सेब और स्ट्रॉबेरी की खेती
जशपुर में सेब की खेती (Tribal Horticulture Chhattisgarh) भी किसानों के लिए नई उम्मीद बनकर उभरी है। वर्ष 2023 में शुरू हुई इस खेती से अब करीब 410 किसान जुड़ चुके हैं। जिले में लगभग 410 एकड़ में सेब के पौधे लगाए गए हैं। मनोरा और बगीचा ब्लॉक के शैला, छतौरी, करदना और छिछली जैसे गांवों में सेब के बाग विकसित हो रहे हैं।
इसके अलावा जिले में करीब 4,500 किसान लीची की खेती से जुड़े हैं, जबकि लगभग 50 स्ट्रॉबेरी उत्पादक भी इसे आमदनी बढ़ाने का माध्यम बना रहे हैं। सेब और स्ट्रॉबेरी जैसी अधिक कीमत वाली फसलें किसानों को पारंपरिक फसलों के साथ अतिरिक्त आय का विकल्प दे रही हैं।
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7,800 किसान कर रहे काजू
जशपुर में काजू की खेती (Tribal Horticulture Chhattisgarh) बड़े पैमाने पर की जा रही है। रीड्स के अनुसार, जिले में करीब 7,800 किसान काजू उत्पादन से जुड़े हैं। कुनकुरी में लगभग 3,000 एकड़, दुलदुला में 2,000 एकड़, कांसाबेल और फरसाबहार में एक-एक हजार एकड़ तथा पत्थलगांव में करीब 800 एकड़ में काजू के बाग लगे हैं। इससे जिले में बागवानी का दायरा बढ़ा है और बड़ी संख्या में किसानों को नकदी फसलों के जरिए आमदनी बढ़ाने का अवसर मिल रहा है।
बलरामपुर-सूरजपुर में भी विस्तार
जशपुर के अलावा बलरामपुर और सूरजपुर में भी बागवानी (Tribal Horticulture Chhattisgarh) को बढ़ावा मिल रहा है। बलरामपुर जिले के शंकरगढ़ ब्लॉक में नाबार्ड और रीड्स के सहयोग से करीब 1,000 किसान यूरोपीय किस्म की नाशपाती उगा रहे हैं। राजपुर ब्लॉक में लगभग 1,000 एकड़ में आम और अमरूद के पौधे लगाए गए हैं।
वहीं, सूरजपुर के प्रतापपुर ब्लॉक में नाबार्ड की वाड़ी विकास योजना के तहत 500 जनजातीय परिवारों ने आम और अमरूद के पौधे लगाए हैं। प्रेमनगर ब्लॉक में भी रीड्स के माध्यम से 500 अन्य जनजातीय परिवारों के बीच बागवानी विकसित की जा रही है। बागवानी का यह विस्तार उत्तरी छत्तीसगढ़ के जनजातीय किसानों के लिए खेती में विविधता लाने, बाजार के नए अवसरों से जुड़ने और आमदनी बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण पहल बन रहा है।
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