सीजी भास्कर, 18 अप्रैल : छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले में विकास और पुनर्वास की एक प्रेरणादायक मिसाल (Tungul Eco Tourism Center) सामने आई है, जहां कभी उपेक्षित और जर्जर रहा इलाका आज पर्यटन और आत्मनिर्भरता का केंद्र बन गया है। वन विभाग की पहल और राज्य सरकार के मार्गदर्शन में तैयार किया गया यह तुंगल इको-पर्यटन केंद्र अब सामाजिक बदलाव की नई कहानी लिख रहा है।
सुकमा नगर से महज एक किलोमीटर दूर स्थित यह केंद्र पहले बदहाल स्थिति में था, लेकिन अब इसे आकर्षक पर्यटन स्थल के रूप में विकसित किया गया है। यहां बनाए गए टापू, हरियाली और प्राकृतिक वातावरण पर्यटकों को अपनी ओर खींच रहे हैं। खास बात यह है कि पड़ोसी राज्य ओडिशा से भी बड़ी संख्या में लोग यहां घूमने पहुंच रहे हैं।
इस पूरे प्रोजेक्ट (Tungul Eco Tourism Center) की सबसे खास पहल “तुंगल नेचर कैफे” है, जिसे ‘आत्मसमर्पण पुनर्वास महिला स्वयं सहायता समूह’ की 10 महिलाएं संचालित कर रही हैं। इनमें 5 महिलाएं वे हैं जिन्होंने नक्सलवाद का रास्ता छोड़कर आत्मसमर्पण किया, जबकि 5 महिलाएं नक्सल हिंसा से प्रभावित रही हैं।
इन महिलाओं को जगदलपुर और सुकमा में विशेष प्रशिक्षण देकर रोजगार के लिए तैयार किया गया। आज ये महिलाएं आत्मविश्वास के साथ पर्यटकों का स्वागत कर रही हैं और सम्मानजनक जीवन जी रही हैं।
3 महीनों में 8,889 पर्यटक पहुंचे
इस केंद्र की सफलता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि 31 दिसंबर 2025 को शुरू होने के बाद 30 मार्च 2026 तक यहां 8 हजार 889 पर्यटक पहुंचे। इस दौरान केंद्र ने लगभग 2.92 लाख रुपए की आय भी अर्जित की है।
पर्यटक यहां स्थानीय व्यंजनों का स्वाद लेने के साथ-साथ तुंगल डैम में कयाकिंग, पैडल बोटिंग और बांस राफ्टिंग जैसी गतिविधियों का भी आनंद ले रहे हैं। यह केंद्र अब सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं, बल्कि स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूत करने का माध्यम भी बन गया है।
यह पहल (Tungul Eco Tourism Center) यह दर्शाती है कि सही दिशा और अवसर मिलने पर जीवन की राह बदली जा सकती है। जो महिलाएं कभी भय और संघर्ष के माहौल में जी रही थीं, वे आज आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी हैं।
बस्तर की बदलती तस्वीर में तुंगल इको-पर्यटन केंद्र एक उज्ज्वल उदाहरण के रूप में उभर रहा है, जो यह संदेश देता है कि प्रकृति संरक्षण और मानव विकास को साथ लेकर समाज में सकारात्मक बदलाव लाया जा सकता है।


