सीजी भास्कर, 05 मई : पश्चिम बंगाल में आए सत्ता परिवर्तन के तूफान के बीच एक ऐसी खामोश ताकत उभरकर सामने आई है, जिसने कई दिग्गजों के अरमानों पर पानी फेर दिया है। यह ताकत किसी पार्टी की नहीं, बल्कि ईवीएम के उस आखिरी बटन यानी ‘नोटा’ की है। बंगाल के इस चुनावी नतीजे (Bengal Election Results 2026) के विश्लेषण में यह चौंकाने वाला खुलासा हुआ है कि सतगछिया, जंगीपाड़ा और इंदस जैसी सीटों पर हार-जीत का फैसला करने वाली कोई राजनीतिक लहर नहीं, बल्कि जनता की वह नाराजगी थी जिसने ‘किसी को नहीं’ चुनने का फैसला किया। हारने वाले उम्मीदवारों के लिए यह टीस ताउम्र बनी रहेगी कि काश वे उन चंद नाराज वोटरों को मना पाते।
सतगछिया और जंगीपाड़ा: जहां नोटा बना ‘किंगमेकर’
सतगछिया विधानसभा सीट पर हार-जीत का गणित किसी सस्पेंस फिल्म जैसा रहा। यहां भाजपा के अग्निस्वर नस्कर ने टीएमसी की सोमश्री बेताल को महज 401 वोटों के मामूली अंतर से पटखनी दी। लेकिन असली खेल तो नोटा के आंकड़ों में छिपा है। इस सीट पर 1654 लोगों ने नोटा का बटन दबाया, जो जीत के अंतर से चार गुना अधिक है। इस बंगाल के चुनावी नतीजे (Bengal Election Results 2026) ने साफ कर दिया कि अगर नोटा दबाने वाले वोटरों का एक छोटा सा हिस्सा भी टीएमसी की ओर झुक जाता, तो आज परिणाम कुछ और होते। यही हाल जंगीपाड़ा का रहा, जहां भाजपा के प्रसेनजित बाग ने 862 वोटों से जीत दर्ज की, जबकि वहां 2388 लोगों ने सभी प्रत्याशियों को सिरे से नकार दिया।
इंदस और रैना: मामूली अंतर और भारी रिजेक्शन
इंदस और रैना सीटों पर भी नोटा ने नेताओं की धड़कनें बढ़ा दीं। इंदस (धनखली) में भाजपा के निर्मल कुमार ने केवल 900 वोटों से बाजी मारी, लेकिन वहां 1582 वोट नोटा के खाते में गए। इसी तरह पुरसुराह में भाजपा के सुभाष पात्रा की 834 वोटों की जीत के सामने 1442 लोगों का ‘रिजेक्शन’ वाला वोट कहीं ज्यादा भारी पड़ गया। इस बंगाल के चुनावी नतीजे (Bengal Election Results 2026) के ये आंकड़े चीख-चीख कर कह रहे हैं कि जनता ने केवल बदलाव के लिए वोट नहीं दिया, बल्कि एक बड़े वर्ग ने पूरे सिस्टम के प्रति अपनी खामोश नाराजगी भी दर्ज कराई है।
ममता के 15 साल के साम्राज्य का अंत
4 मई 2026 की तारीख बंगाल के इतिहास में सुनहरे अक्षरों में दर्ज हो गई है, जहां भाजपा ने 206 से अधिक सीटें जीतकर पहली बार राज्य में ‘कमल’ खिलाया है। ममता बनर्जी का 20 मई 2011 से चला आ रहा शासन अब इतिहास बन चुका है। भवानीपुर की हाई-प्रोफाइल सीट पर शुभेंदु अधिकारी के हाथों ममता बनर्जी की हार ने टीएमसी के मनोबल को पूरी तरह तोड़ दिया है। टीएमसी महज 81 सीटों पर सिमट गई है। हालांकि भाजपा की यह जीत प्रचंड है, लेकिन नोटा के इन ‘रिजेक्शन’ वाले वोटों ने जीत के स्वाद को कुछ सीटों पर कड़वा जरूर कर दिया है।


