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Home » Bastar Forest Fire Prevention Campaign : प्यासे कंठों को पानी पिलाकर लिया जा रहा ये कड़ा संकल्प!

Bastar Forest Fire Prevention Campaign : प्यासे कंठों को पानी पिलाकर लिया जा रहा ये कड़ा संकल्प!

By Newsdesk Admin
29/05/2026
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सीजी भास्कर, 29 मई : इस चिलचिलाती धूप और रूह कंपा देने वाली भीषण गर्मी के बीच छत्तीसगढ़ के बस्तर संभाग से एक ऐसा सस्पेंस और आक्रामक तेवर से भरा सुरक्षा प्लान सामने आया है, जिसकी चर्चा पूरे प्रदेश के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में होने लगी है। अक्सर जंगलों को आग (दावानल) से बचाने के लिए सरकारें भारी-भरकम बजट, बड़ी-बड़ी गाड़ियों और फायर फाइटर्स को मैदान में उतारती हैं, लेकिन इस बार बस्तर के जंगलों को राख होने से बचाने के लिए वन विकास निगम ने एक बेहद अनूठा और चौंकाने वाला ‘साइकोलॉजिकल’ चक्रव्यूह रचा है।

Contents
  • प्याऊ की ओट में वन सुरक्षा की घेराबंदी
  • सूखी पत्तियां बन रही हैं बारूद
  • जलती बीड़ी-सिगरेट फेंकने वालों के खिलाफ चक्रव्यूह
  • वनोपज संग्रहण के नाम पर आग लगाने वालों की अब खैर नहीं
  • खुफिया इनपुट की तरह काम करेगा ग्रामीणों का नेटवर्क
  • जनभागीदारी के बिना नहीं बचेगा बस्तर का वजूद

बस्तर के घने और संवेदनशील जंगलों को आग की लपटों से सुरक्षित रखने के लिए वन विकास निगम जगदलपुर ने एक तीर से दो शिकार करने वाली रणनीति तैयार की है, जिसने नक्सलियों और जंगलों को नुकसान पहुंचाने वाले शरारती तत्वों के होश उड़ा दिए हैं। वन मंत्री केदार कश्यप के सीधे मार्गदर्शन में इस बार बस्तर के प्रमुख मार्गों और हाट-बाजारों के रास्तों पर ‘सार्वजनिक प्याऊ’ केंद्रों का एक ऐसा जाल बिछाया गया है, जो न केवल इंसानों की प्यास बुझा रहा है, बल्कि बस्तर फॉरेस्ट फायर प्रिवेंशन कैंपेन (Bastar Forest Fire Prevention Campaign) के तहत जंगलों को तबाह होने से बचाने का सबसे अचूक हथियार बनकर उभरा है। इस अभियान के तहत हर राहगीर को पानी पिलाने के बाद एक ऐसा कड़ा संकल्प दिलाया जा रहा है, जो बस्तर की हरियाली की रक्षा के लिए एक सुरक्षा कवच बनने जा रहा है।

प्याऊ की ओट में वन सुरक्षा की घेराबंदी

बस्तर संभाग में इस समय पारा रिकॉर्ड तोड़ रहा है और सूखी पत्तियां बारूद की तरह जंगलों में बिछी हुई हैं। ऐसे में छोटी सी लापरवाही भी पूरे बस्तर को स्वाहा कर सकती है। इस भीषण संकट से निपटने के लिए वन विकास निगम ने जो आक्रामक रुख अपनाया है, उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। जंगलों के भीतर और प्रमुख रास्तों पर तैनात वन कर्मी पारंपरिक वर्दी के बजाय अब सेवा भाव से राहगीरों को ठंडा पानी पिला रहे हैं।

असली सस्पेंस इसके ठीक बाद शुरू होता है। जैसे ही कोई ग्रामीण या राहगीर पानी पीकर अपनी प्यास बुझाता है, वहां मुस्तैद वन अमला उसे बस्तर फॉरेस्ट फायर प्रिवेंशन कैंपेन (Bastar Forest Fire Prevention Campaign) की महत्ता समझाते हुए जंगलों को दावानल से बचाने की कसम दिला रहा है। स्थानीय लोग भी सरकार के इस आक्रामक और मानवीय तेवर को देखकर हैरान हैं। आदिवासियों को यह समझाया जा रहा है कि यह जंगल और इसकी वन संपदा ही उनका असली वजूद है, और अगर यह आग की भेंट चढ़ गई, तो बस्तर का अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाएगा।

सूखी पत्तियां बन रही हैं बारूद

गर्मी के इस खौफनाक मौसम में हवाएं इतनी तेज और गर्म हैं कि जंगलों में बिछी सूखी पत्तियां जरा सी चिंगारी मिलते ही नरक जैसी आग में तब्दील हो जाती हैं। हर साल बस्तर के जंगलों में लगने वाली आग से करोड़ों की वन संपदा खाक होती है और बेजुबान वन्यजीव जिंदा जल जाते हैं। इस बार सरकार ने साफ कर दिया है कि वनों को नुकसान पहुंचाने वाली किसी भी कोताही को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

प्याऊ केंद्रों के माध्यम से ग्रामीणों को सीधे चेतावनी भरे लहजे में जागरूक किया जा रहा है कि बस्तर फॉरेस्ट फायर प्रिवेंशन कैंपेन (Bastar Forest Fire Prevention Campaign) का उल्लंघन करने वालों पर इस बार कानून का डंडा बेहद कड़ाई से चलेगा। खासकर महुआ बीनने वाले दिनों में जंगलों की सुरक्षा को लेकर वन विभाग की नजरें चौबीसों घंटे जमीन पर टिकी हुई हैं।

जलती बीड़ी-सिगरेट फेंकने वालों के खिलाफ चक्रव्यूह

इस पूरे महा-अभियान के तहत उन लोगों को रडार पर लिया गया है जो जंगलों के रास्तों से गुजरते समय गैर-जिम्मेदाराना हरकतें करते हैं। वन विकास निगम के कर्मचारियों ने प्याऊ पर रुकने वाले हर मुसाफिर को कड़े निर्देश दिए हैं कि जंगलों से गुजरते समय जलती हुई बीड़ी, सिगरेट या माचिस की तीली कहीं भी न फेंकें। सूखे पत्तों के इस मौसम में एक छोटी सी चिंगारी पल भर में विनाशकारी रूप ले लेती है। बस्तर फॉरेस्ट फायर प्रिवेंशन कैंपेन (Bastar Forest Fire Prevention Campaign) के तहत वन रक्षकों की पेट्रोलिंग टीमें भी अब इन प्याऊ केंद्रों के इनपुट के आधार पर संदिग्ध रास्तों पर लगातार गश्त कर रही हैं, ताकि कोई भी असामाजिक तत्व जंगलों की शांति और सुरक्षा से खिलवाड़ न कर सके।

वनोपज संग्रहण के नाम पर आग लगाने वालों की अब खैर नहीं

बस्तर के आदिवासियों के लिए महुआ और अन्य लघु वनोपज का संग्रहण उनकी आजीविका का मुख्य साधन है, लेकिन इस दौरान पेड़ों के नीचे की जमीन साफ करने के लिए सूखी पत्तियों में आग लगाने की जो पारंपरिक प्रथा है, वह इस बार पूरी तरह प्रतिबंधित कर दी गई है। प्याऊ केंद्रों पर आ रहे आदिवासियों को बेहद संवेदनशील और मानवीय दृष्टिकोण से समझाया जा रहा है कि महुआ संग्रहण के दौरान पेड़ों के नीचे सूखी पत्तियां साफ करने के लिए आग का उपयोग (Bastar Forest Fire Prevention Campaign) बिल्कुल न करें। ऐसा करने से आग की लपटें बेकाबू होकर पूरे वनांचल को अपनी चपेट में ले लेती हैं, जिससे खुद ग्रामीणों के घरों और मवेशियों पर भी संकट आ जाता है।

खुफिया इनपुट की तरह काम करेगा ग्रामीणों का नेटवर्क

वन विकास निगम की इस अनूठी पहल का सबसे बड़ा सस्पेंस यह है कि प्याऊ केंद्रों के जरिए सरकार ने हर एक ग्रामीण को अपना ‘इन्फॉर्मेंर’ बना दिया है। ग्रामीणों से साफ कहा गया है कि यदि कहीं भी जंगल में आग सुलगती दिखाई दे तो (Bastar Forest Fire Prevention Campaign) तत्काल इसकी सूचना नजदीकी वन विकास निगम कार्यालय या गश्त कर रहे वन विभाग के कर्मचारियों को दें। इस त्वरित सूचना तंत्र के कारण अब जैसे ही कहीं से भी धुएं की लकीर दिखेगी, वन विभाग की क्विक रिस्पांस टीम (QRT) मौके पर पहुंचकर आग पर काबू पा लेगी। यह पूरी रणनीति इतनी तेजी से काम कर रही है कि अब जंगलों में आग लगाकर भागने वालों का बचना नामुमकिन होगा।

जनभागीदारी के बिना नहीं बचेगा बस्तर का वजूद

वन विकास निगम के प्रबंध संचालक और आला अधिकारियों ने दोटूक शब्दों में कहा है कि जंगलों को इस भीषण दावानल से बचाने के लिए केवल सरकारी तंत्र काफी नहीं है, बल्कि जनसहभागिता (Bastar Forest Fire Prevention Campaign) सबसे जरूरी और आखिरी रास्ता है। जब तक बस्तर का हर एक नागरिक इस जंग में सरकार के साथ खड़ा नहीं होगा, तब तक हरियाली को बचाना नामुमकिन है। शासन और जनता के इस संयुक्त और आक्रामक प्रयास से अब उम्मीद जगी है कि बस्तर की अमूल्य वन्य संपदा इस बार आग की लपटों से पूरी तरह सुरक्षित रहेगी।

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