सीजी भास्कर, 30 मई। महासमुंद जिले के बसना ब्लॉक अंतर्गत ग्राम पलसापाली से जुड़े एक चर्चित पितृत्व विवाद मामले में सुप्रीम कोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने डीएनए परीक्षण कराने के आदेश को बरकरार रखते हुए स्पष्ट कहा कि जब पितृत्व का प्रश्न सीधे विवाद का विषय हो और उसका समाधान किसी अन्य साक्ष्य से संभव न हो, तब न्यायहित में वैज्ञानिक जांच आवश्यक हो जाती है। (Paternity dispute dna test supreme court)
यह मामला कई वर्षों से न्यायालयों में लंबित था। विवाद उस युवक द्वारा दायर दीवानी वाद से जुड़ा है, जिसमें उसने स्वयं को संबंधित व्यक्ति का पुत्र बताते हुए संपत्ति में हिस्सेदारी का दावा किया था। युवक की माता का कहना था कि वर्ष 1999 में दोनों के बीच संबंध बने थे, जिसके बाद युवक का जन्म हुआ। दूसरी ओर संबंधित व्यक्ति लगातार पितृत्व से इंकार करता रहा।
मामले (Paternity dispute dna test supreme court) में पहले भरण-पोषण को लेकर भी कई कानूनी कार्यवाहियां हुई थीं। निचली अदालतों और बाद में छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने डीएनए परीक्षण कराने का आदेश दिया था। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा था कि पितृत्व का स्पष्ट निर्धारण डीएनए परीक्षण के बिना संभव नहीं है। इसके बाद मामले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।
सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि किसी व्यक्ति को जबरन डीएनए सैंपल देने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता तथा यह निजता के अधिकार का उल्लंघन है। वहीं दूसरी ओर पीड़ित पक्ष की ओर से कहा गया कि लगातार पितृत्व से इंकार किए जाने के कारण सच्चाई सामने लाने का एकमात्र प्रभावी माध्यम डीएनए परीक्षण ही है
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने अपने कई पुराने महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख करते हुए कहा कि भारत में डीएनए परीक्षण सामान्य रूप से आदेशित नहीं किया जाता, लेकिन जब पितृत्व (Paternity dispute dna test supreme court) का प्रश्न सीधे विवाद का विषय हो और उसका उत्तर किसी अन्य साक्ष्य से संभव न हो, तब न्यायालय वैज्ञानिक जांच का आदेश दे सकता है।
अदालत ने अपने महत्वपूर्ण फैसले में कहा कि इस मामले में ऐसा कोई अन्य ठोस साक्ष्य उपलब्ध नहीं है, जो विवाद का अंतिम समाधान दे सके। न्यायालय ने यह भी माना कि यदि इस प्रश्न का स्पष्ट उत्तर कभी सामने नहीं आया, तो संबंधित युवक अपने वैधानिक और संपत्ति संबंधी अधिकारों से वंचित हो सकता है।सुप्रीम कोर्ट ने अंततः अपील खारिज करते हुए संबंधित दीवानी न्यायालय को डीएनए परीक्षण की तिथि निर्धारित कर आगे की कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। इस महत्वपूर्ण मामले में सुप्रीम कोर्ट में पीड़ित पक्ष की ओर से अभिनव श्रीवास्तव व स्थानीय अधिवक्ता बजरंग अग्रवाल की पुत्री अधिवक्ता बरखा अग्रवाल ने पैरवी की।




