सीजी भास्कर, 15 जून। जब मंच पर भजन और जसगीत की मधुर धुन गूंजती है तो श्रोता मंत्रमुग्ध (Blind Musicians) हो जाते हैं। बहुत कम लोगों को पता होता है कि इन सुरों को जीवंत बनाने वाले कलाकार अपनी आंखों से दुनिया नहीं देख सकते। इसके बावजूद उनके आत्मविश्वास और संगीत के प्रति समर्पण ने उन्हें एक अलग पहचान दिलाई है।
छत्तीसगढ़ के कई जिलों में इन कलाकारों की प्रस्तुतियों की चर्चा हो रही है। कठिन परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और संगीत को अपनी ताकत बना लिया। आज उनकी मेहनत और लगन दूसरे लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत बन रही है।
25 से अधिक कलाकारों ने बनाया अपना बैंड : Blind Musicians
प्रदेश के 25 से ज्यादा दृष्टिहीन कलाकारों ने मिलकर एक अनोखा संगीत समूह तैयार किया है। जसगीत बैंड के नाम से पहचान बना चुका यह समूह भजन, जसगीत और जगराता कार्यक्रमों में अपनी प्रस्तुति देकर लोगों का दिल जीत रहा है। बैंड की खास बात यह है कि अधिकांश कलाकारों ने किसी संस्थान से औपचारिक संगीत शिक्षा नहीं ली है। उन्होंने लगातार अभ्यास और मेहनत के दम पर संगीत की बारीकियां सीखकर अपनी अलग पहचान बनाई है।
स्पर्श से पहचानते हैं सुरों की दुनिया
बैंड के सदस्य सूरज यादव ने हारमोनियम से अपनी संगीत यात्रा शुरू की और बाद में स्वयं कीबोर्ड बजाना भी सीख लिया। वहीं दिवेश कुमार साहू स्पर्श के आधार पर वाद्ययंत्रों के बटन पहचानकर शानदार प्रस्तुति देते हैं। सभी कलाकार नियमित रूप से अभ्यास करते हैं और विभिन्न कार्यक्रमों की जरूरत के अनुसार अपनी तैयारी करते हैं। उनके लिए संगीत केवल मनोरंजन का साधन नहीं बल्कि आत्मनिर्भर बनने का रास्ता भी है।
सपनों को उड़ान देने की तैयारी
बैंड से जुड़ी हिरौतिन पुरामे का सपना अपना संगीत एल्बम जारी करने (Blind Musicians) का है। उनका कहना है कि समूह के सभी सदस्य अपनी कला को और बड़े मंच तक पहुंचाना चाहते हैं। प्रदेश के अलग अलग क्षेत्रों में कार्यक्रमों के लिए जाते समय उन्हें कई चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, लेकिन इन कठिनाइयों ने उनके हौसले को कभी कमजोर नहीं किया।
स्कूल से शुरू हुआ सफर
बैंड के अध्यक्ष रितिक ठाकुर बताते हैं कि स्कूल के दिनों में एक साथ मंच साझा करने के दौरान अपना संगीत समूह बनाने का विचार सामने आया था। इसके बाद कलाकारों को जोड़ने और उन्हें एक मंच पर लाने का प्रयास शुरू किया गया। धीरे धीरे यह प्रयास सफल हुआ और आज यह समूह कई सांस्कृतिक कार्यक्रमों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है।
दया नहीं, अवसर की जरूरत
कलाकारों का कहना है कि दिव्यांग प्रतिभाओं को अब भी पर्याप्त अवसर नहीं मिल (Blind Musicians) पाते हैं। उन्हें अपनी पहचान बनाने के लिए अतिरिक्त मेहनत करनी पड़ती है। उनका मानना है कि समाज उन्हें सहानुभूति की नजर से देखने के बजाय अवसर और सहयोग प्रदान करे। इससे वे अपनी प्रतिभा को और बेहतर तरीके से सामने ला सकेंगे तथा नए कलाकारों के लिए भी प्रेरणा बनेंगे।
दृष्टिहीन होने के बावजूद इन कलाकारों ने साबित कर दिया है कि मजबूत इरादों और लगातार प्रयास से किसी भी चुनौती को पार किया जा सकता है। उनकी सफलता यह संदेश देती है कि प्रतिभा को पहचानने के लिए आंखों की नहीं, हौसलों की जरूरत होती है।





