सीजी भास्कर, 10 जुलाई : छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में अपराधों की जांच और साक्ष्यों को लेकर महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। चीफ जस्टिस रमेश सिन्हा और जस्टिस रवींद्र कुमार अग्रवाल की डिवीजन बेंच ने कहा कि नक्सल प्रभावित इलाकों में हर समय स्वतंत्र गवाह मिलना व्यावहारिक नहीं होता। (Chhattisgarh High Court Naxal Verdict)
- बीजापुर में माओवादी के पास मिला था डेटोनेटर : Chhattisgarh High Court Naxal Verdict
- NIA कोर्ट ने सुनाई थी 10 साल की सजा
- बचाव पक्ष ने उठाए थे ये सवाल : Chhattisgarh High Court Naxal Verdict
- हाईकोर्ट बोला- हर मामले में स्वतंत्र गवाह संभव नहीं
- पुलिस गवाहों की गवाही विश्वसनीय, सजा बरकरार : Chhattisgarh High Court Naxal Verdict
ऐसे मामलों में यदि पुलिस अधिकारियों की गवाही विश्वसनीय और भरोसेमंद हो, तो केवल उसी के आधार पर भी आरोपी को दोषी ठहराया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ पुलिसकर्मी होने के कारण किसी गवाह की गवाही को खारिज नहीं किया जा सकता। इसी टिप्पणी के साथ हाईकोर्ट ने प्रतिबंधित माओवादी संगठन से जुड़े एक आरोपी की अपील खारिज करते हुए उसकी 10 साल की सजा बरकरार रखी है।
बीजापुर में माओवादी के पास मिला था डेटोनेटर : Chhattisgarh High Court Naxal Verdict
मामले के अनुसार 14 अप्रैल 2023 को बीजापुर जिले के भैरमगढ़ क्षेत्र में पुलिस को मुखबिर से सूचना मिली थी कि प्रतिबंधित माओवादी संगठन के सदस्य पुलिस पार्टी पर हमला करने के लिए विस्फोटक सामग्री लेकर जा रहे हैं। सूचना के आधार पर पुलिस ने फुल्लोड गांव के पास घेराबंदी की। पुलिस को देखते ही कुछ लोग जंगल की ओर भाग निकले, जबकि मीनू कालमु उर्फ देंगा को मौके से पकड़ लिया गया। तलाशी के दौरान उसकी जेब से एक इलेक्ट्रिक डेटोनेटर बरामद हुआ। उसकी निशानदेही पर खेत से एक चाकू और विस्फोटकों से भरा बैग भी जब्त किया गया।
NIA कोर्ट ने सुनाई थी 10 साल की सजा
दंतेवाड़ा स्थित एनआईए की विशेष अदालत ने सितंबर 2025 में मीनू कालमु को विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 और 5 के तहत दोषी ठहराते हुए 10 वर्ष के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी। इस फैसले को आरोपी ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
बचाव पक्ष ने उठाए थे ये सवाल : Chhattisgarh High Court Naxal Verdict
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष ने दलील दी कि मामले का एकमात्र स्वतंत्र गवाह अदालत में अपने बयान से मुकर गया था। पूरी कार्रवाई केवल पुलिस अधिकारियों की गवाही पर आधारित है, इसलिए आरोपी को संदेह का लाभ दिया जाना चाहिए। यह भी कहा गया कि कथित विस्फोटक खेत से बरामद हुआ था, इसलिए बरामदगी पर संदेह है।
हाईकोर्ट बोला- हर मामले में स्वतंत्र गवाह संभव नहीं
डिवीजन बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के विभिन्न फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि हर जगह और हर समय स्वतंत्र गवाह मिलना संभव नहीं होता। विशेषकर नक्सल प्रभावित और घने जंगलों वाले इलाकों में पुलिस अक्सर खुफिया सूचना के आधार पर कार्रवाई करती है। ऐसे मामलों में केवल स्वतंत्र गवाह नहीं मिलने के आधार पर पूरी कार्रवाई को अविश्वसनीय नहीं माना जा सकता।
पुलिस गवाहों की गवाही विश्वसनीय, सजा बरकरार : Chhattisgarh High Court Naxal Verdict
हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस अधिकारियों के बयानों में कोई महत्वपूर्ण विरोधाभास नहीं है और उनकी गवाही पूरी तरह विश्वसनीय है। साथ ही आरोपी यह भी स्पष्ट नहीं कर सका कि उसके पास से बरामद इलेक्ट्रिक डेटोनेटर कैसे मिला। इन सभी तथ्यों को देखते हुए अदालत ने आरोपी की अपील खारिज कर दी और 10 साल की सजा को बरकरार रखा।



