सीजी भास्कर 17 अप्रैल
छत्तीसगढ़ में जबरन धर्मांतरण को रोकने लिए ‘छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य (संशोधन) विधेयक 2026’ लागू हो गया है. वहीं इसे लेकर विवाद भी चल रहा था, जो अब हाई कोर्ट पहुंच गया है. मसीही समाज के प्रतिनिधि क्रिस्टोफर पॉल ने इस विधेयक के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की है. इसमें कानून के कई कड़े प्रावधानों को असंवैधानिक बताते हुए निरस्त करने की मांग की गई है.
छत्तीसगढ़ में धर्म स्वातंत्र्य विधेयक के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर हाईकोर्ट में मसीही समाज के क्रिस्टोफर पॉल ने याचिका दाखिल की है. जिसमें ‘धर्म स्वतंत्रता विधेयक 2026’ के कई प्रावधानों को चुनौती दी गई है. खासतौर पर जबरन धर्मांतरण पर आजीवन सजा के प्रावधान पर सवाल उठाए गए हैं. याचिकाकर्ता का कहना है कि यह विधेयक संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन करता है. जो प्रत्येक नागरिक को धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार देता है…ऐसे में इस कानून को असंवैधानिक बताया जा रहा है. वहीं दूसरी ओर सरकार का साफ कहना है कि इस विधेयक का मकसद किसी की धार्मिक स्वतंत्रता को रोकना नहीं, बल्कि जबरन और प्रलोभन देकर कराए जा रहे धर्मांतरण पर रोक लगाना है.
जबरन धर्मांतरण पर आजीवन कारावास तक की सजा
दरअसल, राज्य सरकार के इस विधेयक में जबरन, प्रलोभन या धोखाधड़ी से धर्मांतरण पर कड़ी सजा का प्रावधान किया गया है. नए कानून के अनुसार अवैध धर्मांतरण पर 10 साल से लेकर आजीवन कारावास तक की सजा का प्रावधान किया गया है.
कुछ न कुछ गड़बड़ है – गजेन्द्र यादव
इस मामले पर कैबिनेट मंत्री गजेन्द्र यादव का कहना है…“लोग न्यायालय जा रहे हैं, आंदोलन कर रहे हैं. इससे साफ है कि कुछ न कुछ गड़बड़ है. जबरदस्ती धर्मांतरण करने वालों पर कार्रवाई होगी. सरकार इस मामले में अडिग है…”इस विधेयक को लेकर प्रदेश में सियासी और सामाजिक बहस तेज हो गई है. एक ओर विरोध और आंदोलन हो रहे हैं, तो दूसरी ओर सरकार इसे जनहित में जरूरी कदम बता रही है. अब इस पूरे मामले पर सबकी नजर हाई कोर्ट के फैसले पर टिकी है, जो तय करेगा कि यह विधेयक संविधान की कसौटी पर कितना खरा उतरता है.


