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Chhattisgarh Elephant Deaths : योजनाएं कई, लेकिन हाथी नहीं बचे; छत्तीसगढ़ में 6 साल में 70 मौतों ने संरक्षण मॉडल पर खड़े किए बड़े सवाल

By Newsdesk Admin
15/03/2026
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सीजी भास्कर, 15 मार्च। छत्तीसगढ़ में हाथियों के संरक्षण को लेकर वर्षों से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, लेकिन जमीनी हालात अब इन दावों की सख्त परीक्षा लेते नजर (Chhattisgarh Elephant Deaths) आ रहे हैं। पिछले छह वर्षों में प्रदेश में 70 हाथियों की मौत दर्ज होना सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, बल्कि उस संरक्षण ढांचे पर गंभीर सवाल है, जिसे लगातार मजबूत बताए जाने की कोशिश की जाती रही है।
सबसे चिंताजनक तस्वीर वर्ष 2025 में सामने आई, जब अकेले 16 हाथियों की मौत दर्ज की गई। इनमें सात शावक ऐसे रहे, जिनकी जान नदी, तालाब या दलदली जलाशयों में डूबने से चली गई। यह स्थिति बताती है कि खतरा सिर्फ मानव-हाथी संघर्ष तक सीमित नहीं है, बल्कि प्राकृतिक और कृत्रिम जलस्रोत भी अब हाथियों, खासकर बच्चों, के लिए जानलेवा साबित हो रहे हैं।

वन विभाग के उपलब्ध आंकड़े यह भी दिखाते हैं कि करंट वाले तार अब भी हाथियों के लिए बड़ा जोखिम बने हुए हैं। खेतों की सुरक्षा के नाम पर लगाए गए अवैध विद्युत तारों की चपेट में आकर वर्ष 2020 में 3, वर्ष 2021 में 4, वर्ष 2022 में 9 और वर्ष 2023 से जनवरी 2026 के बीच 14 हाथियों की मौत हुई है।
यह पैटर्न साफ करता है कि मानव-हाथी संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए जो उपाय किए जा रहे हैं, वे अभी पर्याप्त असर नहीं दिखा पा रहे। ग्रामीणों को जागरूक करने और अवैध करंट तार लगाने वालों पर कार्रवाई की बात जरूर कही जाती है, लेकिन मौतों का सिलसिला इस बात का संकेत है कि समस्या की जड़ तक पहुंचने वाली ठोस रोकथाम अभी भी कमजोर है।

और भी ज्यादा चिंता उन घटनाओं को लेकर है, जिनमें शावक हाथी तालाबों, गहरे जलभराव वाले गड्ढों और दलदली क्षेत्रों में फंसकर (Chhattisgarh Elephant Deaths) मर रहे हैं। वर्ष 2025 में सात शावकों की डूबने से मौत होना किसी एक बार की दुर्घटना नहीं माना जा सकता।
यह लगातार बन रहे उस जोखिम की ओर इशारा करता है, जिसे हाथियों के मूवमेंट वाले इलाकों में समय रहते चिह्नित और नियंत्रित किया जाना चाहिए था। अगर किसी क्षेत्र में हाथियों की नियमित आवाजाही है, तो वहां मौजूद तालाब, खदाननुमा गड्ढे, दलदल और गहरे जलाशय सिर्फ भूगोल का हिस्सा नहीं रह जाते, वे वन्यजीव सुरक्षा का सीधा सवाल बन जाते हैं।

वन्यजीव विशेषज्ञों का मानना है कि जिन इलाकों में हाथियों के डूबने की घटनाएं बार-बार सामने आ रही हैं, वहां जलस्रोतों और दलदली पट्टियों की वैज्ञानिक मैपिंग की जानी चाहिए। इसके साथ ही इन जगहों पर भौतिक सुरक्षा उपाय, चेतावनी व्यवस्था और निगरानी तंत्र विकसित करना जरूरी है। हाथियों के लिए कॉरिडोर संरक्षण की बात तब तक अधूरी रहेगी, जब तक उनके रास्ते में आने वाले खतरनाक बिंदुओं की पहचान कर उन्हें सुरक्षित नहीं बनाया जाता। सिर्फ ट्रैकिंग से खतरा नहीं टलता, जोखिम वाले स्थलों का सक्रिय प्रबंधन भी उतना ही जरूरी है।

प्रदेश में सबसे ज्यादा चिंताजनक तस्वीर रायगढ़ वन मंडल से सामने आई है। यहां हाथियों की मौत के मामलों में शावकों की बड़ी हिस्सेदारी (Chhattisgarh Elephant Deaths) रही है और सात में से पांच शावकों की मौत तालाबों में डूबने या दलदल में फंसने से हुई है। यह बताता है कि जिन इलाकों में हाथियों की आवाजाही लगातार दर्ज हो रही है, वहां जलस्रोतों के आसपास पर्याप्त एहतियात अब तक नहीं बरती गई। अगर किसी वन मंडल में एक जैसी घटनाएं बार-बार हो रही हैं, तो उसे सामान्य दुर्घटना नहीं, बल्कि सिस्टम फेल्योर की तरह देखा जाना चाहिए।

छत्तीसगढ़ में हाथियों की संख्या, उनके मूवमेंट और मानव बस्तियों के करीब बढ़ते प्रवेश को देखते हुए कई परियोजनाएं शुरू की गई हैं। लेमरू हाथी रिजर्व, प्रोजेक्ट एलीफेंट, हाथी ट्रैकिंग ऐप, हाथी मित्र दल और एआई आधारित निगरानी प्रणाली जैसी पहलें कागज पर प्रभावशाली दिखती हैं। इनका मकसद हाथियों की गतिविधियों पर नजर रखना, कॉरिडोर की सुरक्षा करना और मानव-हाथी संघर्ष को कम करना है। लेकिन जब लगातार मौतें दर्ज हो रही हों, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या योजनाएं सही दिशा में लागू हो रही हैं, या वे सिर्फ प्रशासनिक उपलब्धियों की सूची भर बनकर रह गई हैं।

प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वाइल्ड लाइफ) अरुण कुमार पांडे के मुताबिक कई जगह तालाबों को गहरे गड्ढों की तरह खोद दिया जाता है, जिससे हाथियों के बच्चों के डूबने की घटनाएं होती हैं। विभाग का कहना है कि ऐसी घटनाओं पर निगरानी रखी जा रही है और लोगों को जागरूक भी किया जा रहा है। साथ ही हाथियों की मौत के पीछे बीमारियों को भी एक अहम कारण बताया गया है। लेकिन सवाल यही है कि जब कारणों की पहचान मौजूद है, तब रोकथाम की प्रभावी और दिखाई देने वाली व्यवस्था क्यों नहीं बन पा रही। क्योंकि किसी भी संरक्षण योजना की असली सफलता उसके दस्तावेजों में नहीं, मौतों के घटते आंकड़ों में दिखती है।

छत्तीसगढ़ में हाथी संरक्षण का मुद्दा अब सिर्फ वन्यजीव नीति का विषय नहीं रहा, बल्कि यह प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल (Chhattisgarh Elephant Deaths) बन चुका है। एक ओर राज्य में हाथी संरक्षण की बड़ी-बड़ी परियोजनाएं चल रही हैं, दूसरी ओर शावक तालाबों में डूब रहे हैं, हाथी करंट की चपेट में आ रहे हैं और संघर्ष के मामले कम होने के बजाय चिंता बढ़ा रहे हैं। ऐसे में यह साफ है कि अब सिर्फ योजनाओं की गिनती नहीं, उनकी जमीनी उपयोगिता और वास्तविक असर की जांच जरूरी है। वरना संरक्षण का ढांचा बना रहेगा, लेकिन हाथी लगातार खत्म होते रहेंगे।

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