हाई कोर्ट ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की सिंगल बेंच ने कहा कि यदि बच्चे अपने बुजुर्ग माता-पिता को मानसिक या शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते हैं, तो उन्हें घर से बेदखल किया जा सकता है।
हाई कोर्ट ने बिलासपुर के एक बेटा-बहू की याचिका को खारिज करते हुए मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल और अपीलीय ट्रिब्यूनल के बेदखली के आदेश को सही ठहराया है। फैसले में कहा कि वरिष्ठ नागरिक अधिनियम 2007 केवल भरण-पोषण तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका उद्देश्य बुजुर्गों को उनके जीवन के अंतिम पड़ाव में सम्मान, शांति और सुरक्षा देना भी है।
बिलासपुर के मुंगेली रोड स्थित मिनोचा कॉलोनी में रहने वाली 93 वर्षीय बुजुर्ग महिला संतोष खन्ना ने मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल (एसडीओ कोर्ट) में एक आवेदन पेश किया था। वृद्धा का आरोप था कि उनके मकान की पहली मंजिल पर रहने वाले बड़े बेटे देवेंद्र खन्ना और बहू नीरजा खन्ना उन्हें लगातार प्रताड़ित और परेशान कर रहे हैं।
बुजुर्ग मां ने आशंका जताई थी कि उनके जीवन को बेटा-बहू से खतरा है, जिसके बाद उन्होंने उन्हें घर से बेदखल करने की गुहार लगाई थी। मां की शिकायत और पेश किए गए दस्तावेजों यानी बिजली बिल, राजस्व रिकॉर्ड आदि के आधार पर मेंटेनेंस ट्रिब्यूनल ने 12 सितंबर 2024 को बेटा-बहू को घर खाली करने का आदेश दिया था।
इसके खिलाफ बेटा-बहू ने कलेक्टर (अपीलीय ट्रिब्यूनल) के पास अपील की, लेकिन 25 नवंबर 2024 को अपील खारिज हो गई। इसके बाद बेटा-बहू ने हाई कोर्ट में याचिका लगाई और ट्रिब्यूनल के अधिकार क्षेत्र को चुनौती दी थी। हाई कोर्ट ने फैसले में कहा कि ट्रिब्यूनल ने मालिकाना हक की घोषणा नहीं की है, बल्कि एक बुजुर्ग मां की शांतिपूर्ण जिंदगी और सुरक्षा के लिए निर्देश दिए हैं।
संपत्ति का कोई भी आंतरिक विवाद सिविल कोर्ट में चलता रह सकता है, लेकिन इसके आधार पर बुजुर्ग मां को उनके कानूनी संरक्षण से वंचित नहीं किया जा सकता। इस आधार पर हाई कोर्ट ने बेटे- बहू की याचिका खारिज कर दी है।
तर्क दिया- संपत्ति विवाद सिविल कोर्ट का मामला
बेटा-बहू ने याचिका में तर्क दिया कि ट्रिब्यूनल को किसी को घर से बेदखल करने का अधिकार नहीं है। मकान के मालिकाना हक को लेकर विवाद है, जिसे केवल सिविल कोर्ट ही तय कर सकता है। बुजुर्ग मां को पेंशन मिलती है और उन्होंने किसी भरण-पोषण राशि की मांग नहीं की थी, इसलिए यह मामला इस अधिनियम के तहत नहीं आता। वे खुद भी वरिष्ठ नागरिक हैं, इसलिए उन्हें बेदखल नहीं किया जाना चाहिए।
हाई कोर्ट बोला– शांति से रहने देना भी अधिकार
हाई कोर्ट ने कहा कि भरण-पोषण शब्द का अर्थ बेहद व्यापक है। इसमें केवल भोजन या पैसा देना ही शामिल नहीं है, बल्कि बुजुर्गों को गरिमा और शांति के साथ रहने का माहौल देना भी शामिल है। अगर कोई बुजुर्ग आर्थिक रूप से सक्षम है, लेकिन उसे प्रताड़ित किया जा रहा है, तो ट्रिब्यूनल को उसे संरक्षण देने का पूरा अधिकार है।



