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High Court : 20 साल पुराने हादसे में अदालत ने क्यों बदला फैसला, सजा बरकरार लेकिन मिली बड़ी राहत

By Newsdesk Admin
22/06/2026
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सीजी भास्कर, 22 जून। करीब दो दशक पुराने एक सड़क हादसे से जुड़े मामले में हाई कोर्ट के फैसले ने कानूनी गलियारों में चर्चा (High Court) बढ़ा दी है। लंबे समय से न्यायिक प्रक्रिया से गुजर रहे इस मामले में अदालत ने दोषसिद्धि को बरकरार रखा, लेकिन सजा को लेकर अलग दृष्टिकोण अपनाया। फैसले के बाद यह मामला एक बार फिर लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।

Contents
  • वर्ष 2005 का है मामला High Court
  • निचली अदालत ने सुनाई थी सजा
  • दोषसिद्धि में नहीं मिला बदलाव
  • सजा में दिखाई नरमी
  • पीड़ित परिवार को मिलेगा मुआवजा
  • मानवीय दृष्टिकोण का उल्लेख

अदालत ने अपने आदेश में मामले की पुरानी परिस्थितियों, आरोपी के व्यवहार और न्यायिक प्रक्रिया के दौरान उसके आचरण को महत्वपूर्ण माना। इसी आधार पर अदालत ने सजा के प्रश्न पर नरमी दिखाते हुए विशेष राहत प्रदान की है।

बिलासपुर हाई कोर्ट ने 20 वर्ष पुराने सड़क हादसे के एक मामले में आरोपी को राहत देते हुए उसकी दोषसिद्धि बरकरार रखी है। न्यायमूर्ति रजनी दुबे की एकलपीठ ने कहा कि आरोपी हरीश कुमार उर्फ रामसागर वर्मा को दोबारा जेल भेजना आवश्यक नहीं है। अदालत ने उसकी सजा को पहले से काटी गई अवधि तक सीमित कर दिया है।

वर्ष 2005 का है मामला High Court

यह मामला 26 अक्टूबर 2005 का है। बलौदाबाजार जिले में ट्रैक्टर ट्राली की तेज और लापरवाहीपूर्ण ड्राइविंग के दौरान एक किशोर वाहन से गिर गया था। इस दुर्घटना में प्रकाशमणि नामक किशोर की मौत हो गई थी।

निचली अदालत ने सुनाई थी सजा

मामले की सुनवाई के बाद निचली अदालत ने आरोपी को भारतीय दंड संहिता की धारा 304 ए और मोटरयान अधिनियम की विभिन्न धाराओं के तहत दोषी ठहराते हुए छह माह के सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी। बाद में अपीलीय अदालत ने भी इस निर्णय को बरकरार रखा था।

दोषसिद्धि में नहीं मिला बदलाव

हाई कोर्ट ने उपलब्ध साक्ष्यों और रिकॉर्ड का परीक्षण करने के बाद दोषसिद्धि (High Court) को सही माना। अदालत ने स्पष्ट किया कि आरोपी के खिलाफ दर्ज अपराध और उसकी जिम्मेदारी को लेकर कोई राहत नहीं दी जा रही है।

सजा में दिखाई नरमी

अदालत ने माना कि घटना को लगभग 20 वर्ष बीत चुके हैं। इस दौरान आरोपी ने न्यायिक प्रक्रिया में सहयोग किया और जमानत का किसी प्रकार दुरुपयोग नहीं किया। साथ ही वह पहले ही 10 दिन जेल में रह चुका है। इन परिस्थितियों को देखते हुए अदालत ने सजा को पहले से भुगती गई अवधि तक सीमित कर दिया।

पीड़ित परिवार को मिलेगा मुआवजा

हाई कोर्ट ने आरोपी पर 10 हजार रुपये का अर्थदंड भी लगाया है। अदालत ने निर्देश दिया है कि यह पूरी राशि मृतक के वैध वारिसों को प्रदान की जाए। इसके अलावा आरोपी को छह माह के लिए 25 हजार रुपये का व्यक्तिगत बांड भरने का निर्देश भी दिया गया है।

मानवीय दृष्टिकोण का उल्लेख

फैसले में अदालत ने यह माना कि लंबे समय से लंबित मामले, आरोपी का आचरण और परिस्थितियां ऐसे पहलू हैं जिन पर विचार किया जाना (High Court) चाहिए। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सजा में राहत दी गई, जबकि दोषसिद्धि को यथावत रखा गया।

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