सीजी भास्कर, 13 जुलाई। बिलासपुर में आए एक अहम न्यायिक फैसले ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की शक्तियों को लेकर चल रही कानूनी स्थिति को स्पष्ट (High Court) कर दिया है। अदालत के फैसले के बाद आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। फैसले में साफ किया गया कि आयोग की भूमिका क्या है और वह किन मामलों में आदेश जारी कर सकता है।
मामले की सुनवाई के दौरान अदालत ने आयोग की वैधानिक सीमाओं पर विस्तार से विचार किया। इसके बाद न्यायालय ने माना कि आयोग सलाह और सिफारिश करने वाली संस्था है, लेकिन उसे किसी पक्ष से धनराशि की वसूली कराने का अधिकार कानून ने नहीं दिया है।
हार्वेस्टर मशीन के सौदे से जुड़ा था मामला High Court
विवाद एक हार्वेस्टर मशीन की खरीद से जुड़ा था। मशीन की आपूर्ति समय पर नहीं होने के बाद खरीदार ने छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत पर सुनवाई के बाद आयोग ने संबंधित कलेक्टर को निर्देश दिया कि 1 लाख 26 हजार 500 रुपये की राशि वसूलकर शिकायतकर्ता को दिलाई जाए। इस आदेश को कमला मोटर्स ने बिलासपुर हाईकोर्ट में चुनौती देते हुए रिट याचिका दायर की।
आयोग की भूमिका पर अदालत की टिप्पणी
याचिकाकर्ता की ओर से अदालत में कहा गया कि छत्तीसगढ़ राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम 1995 के अनुसार आयोग केवल मामलों की जांच कर सकता है और सरकार को अपनी सिफारिश भेज सकता है। अधिनियम में उसे किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ धन वसूली का आदेश जारी करने की शक्ति नहीं दी गई है। सुनवाई के दौरान अदालत ने इन दलीलों पर सहमति जताई और माना कि आयोग को जांच के लिए सीमित अधिकार दिए गए हैं, जिन्हें सिविल न्यायालय की शक्तियों के बराबर नहीं माना जा सकता।
रिकवरी का आदेश किया निरस्त
जस्टिस एके प्रसाद की एकलपीठ ने कहा कि आयोग किसी सक्षम न्यायिक या वैधानिक प्राधिकारी की तरह रिकवरी का आदेश पारित नहीं (High Court) कर सकता। यदि आयोग अपनी निर्धारित सीमा से बाहर जाकर ऐसा आदेश देता है तो वह कानून के अनुरूप नहीं माना जाएगा। इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग द्वारा जारी वसूली संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया।
फैसले से अधिकारों की सीमा हुई स्पष्ट High Court
अदालत के इस निर्णय को राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग की वैधानिक शक्तियों की स्पष्ट व्याख्या के रूप में देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि भविष्य में आयोग के समक्ष आने वाले मामलों में यह फैसला महत्वपूर्ण कानूनी आधार बनेगा और आयोग के अधिकार क्षेत्र को लेकर मार्गदर्शन देगा।



