सीजी भास्कर, 20 जून : राजस्थान में लगातार बढ़ रही बिजली की मांग और कोयले (Kente Extension Coal Block) की उपलब्धता की चुनौती के बीच राज्य को बड़ी राहत मिलने की संभावना बनी है। छत्तीसगढ़ के हसदेव-अरण्य क्षेत्र में स्थित केंते एक्सटेंशन ओपन कास्ट कोल ब्लॉक को वन भूमि उपयोग के लिए सैद्धांतिक मंजूरी मिलने के बाद राजस्थान की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत आधार मिलने की उम्मीद जताई जा रही है। इस परियोजना के शुरू होने से राज्य के प्रमुख ताप विद्युत संयंत्रों के लिए कोयले की नियमित आपूर्ति सुनिश्चित हो सकेगी और लंबे समय से बनी आपूर्ति संबंधी चुनौतियों में कमी आएगी।
बिजली उत्पादन को मिलेगा मजबूत आधार
केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक से उत्पादित कोयले का उपयोग मुख्य रूप से राजस्थान के छबड़ा और सूरतगढ़ ताप विद्युत संयंत्रों में किया जाएगा। वर्तमान में इन दोनों बिजलीघरों को प्रतिवर्ष लगभग 24.05 मिलियन टन कोयले की आवश्यकता होती है। हालांकि उपलब्ध स्रोतों से पूरी जरूरत पूरी नहीं हो पा रही थी, जिससे बिजली उत्पादन पर दबाव बना रहता था।
नई खदान से प्रतिवर्ष लगभग 90 लाख टन अतिरिक्त कोयले की उपलब्धता होने की संभावना है। ऊर्जा विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राजस्थान की बिजली उत्पादन क्षमता को स्थिरता मिलेगी और बाहरी स्रोतों से महंगे कोयले की खरीद पर निर्भरता कम होगी। अनुमान है कि यह अतिरिक्त कोयला जयपुर शहर की लगभग डेढ़ वर्ष की औसत बिजली आवश्यकता के बराबर ऊर्जा उपलब्ध कराने में सक्षम होगा।
हसदेव-अरण्य क्षेत्र में होगा खनन
प्रस्तावित परियोजना के लिए लगभग 1743 हेक्टेयर वन भूमि का उपयोग किया जाएगा। यह क्षेत्र हसदेव-अरण्य के घने जंगलों का हिस्सा है, जिसे छत्तीसगढ़ के महत्वपूर्ण वन क्षेत्रों में गिना जाता है। यहां समृद्ध जैव विविधता मौजूद है और कई वन्यजीव प्रजातियों का प्राकृतिक आवास भी यही क्षेत्र है।
वन विभाग के अभिलेखों के अनुसार इस इलाके में हाथी, तेंदुआ, भालू, चीतल, लकड़बग्घा, सियार और पैंगोलिन जैसे वन्यजीव पाए जाते हैं। परियोजना के कारण बड़ी संख्या में पेड़ों के प्रभावित होने की आशंका जताई जा रही है। इसी वजह से पर्यावरणीय प्रभावों और वन संरक्षण को लेकर भी चर्चा तेज हो गई है।
कई शर्तों के साथ मिली स्टेज-1 मंजूरी
केंते एक्सटेंशन कोल ब्लॉक को फिलहाल स्टेज-1 यानी सैद्धांतिक वन मंजूरी प्रदान की गई है। खनन कार्य को दो चरणों में संचालित करने की योजना बनाई गई है। पहले चरण में लगभग 1002 हेक्टेयर क्षेत्र में अधिकतम 15 वर्षों तक खनन किया जाएगा। इसके बाद पर्यावरणीय मानकों, वन्यजीव संरक्षण और जैव विविधता पर प्रभाव की समीक्षा की जाएगी।
समीक्षा के आधार पर ही दूसरे चरण की स्वीकृति पर निर्णय लिया जाएगा। इससे परियोजना के दौरान पर्यावरणीय प्रभावों पर निगरानी बनाए रखने का प्रयास किया जाएगा।
पर्यावरण संरक्षण के लिए भी लागू होंगी विशेष शर्तें
परियोजना संचालित करने वाली कंपनी को प्रतिपूरक वनीकरण, वन भूमि के बदले नए वन विकसित करने, वन्यजीव संरक्षण योजना लागू करने तथा मिट्टी एवं जल संरक्षण से जुड़े कार्यों पर भी निवेश करना होगा। इसके अलावा प्रभावित क्षेत्रों में पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रबंधन योजनाओं को लागू करना अनिवार्य होगा।
खनन परियोजना के साथ कोयला परिवहन के लिए रेलवे कनेक्टिविटी, लॉजिस्टिक नेटवर्क और अन्य बुनियादी ढांचे के विकास पर भी कार्य किया जाएगा, जिससे कोयले की आपूर्ति सुगम और लागत प्रभावी बन सके।
ऊर्जा सुरक्षा और पर्यावरण के बीच संतुलन की चुनौती
विशेषज्ञों का मानना है कि केंते एक्सटेंशन परियोजना राजस्थान की दीर्घकालिक ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। बढ़ती बिजली मांग को देखते हुए यह परियोजना राज्य के लिए रणनीतिक रूप से अहम मानी जा रही है। हालांकि इसके साथ वन संरक्षण, जैव विविधता और पर्यावरणीय प्रभावों से जुड़ी चुनौतियां भी सामने हैं।
ऐसे में परियोजना के क्रियान्वयन के दौरान पर्यावरणीय शर्तों का कड़ाई से पालन, वन्यजीव संरक्षण और सतत विकास के सिद्धांतों को प्राथमिकता देना आवश्यक होगा, ताकि ऊर्जा जरूरतों और पर्यावरणीय संतुलन के बीच उचित सामंजस्य स्थापित किया जा सके।





